मृत्यु के बाद :: संबंधों की सोच

यदि मनुष्य के मन को पढ़ने वाली मशीन होती
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मृत्यु, शोक और मनुष्य के भीतर छिपे स्वार्थ का एक अदृश्य संसार

एक मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक एवं आत्मविश्लेषणात्मक निबंध

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य उसकी मृत्यु नहीं, बल्कि उसके आसपास जीवित बचे लोगों का मन है।

जब तक मनुष्य जीवित रहता है, वह अपने परिवार का पिता होता है, किसी का पति, किसी का भाई, किसी का सहारा और किसी का संरक्षक। उसके पास पैसा है, संपत्ति है, पद है अथवा परिवार के महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार है, तो उसका विशेष महत्व बना रहता है।

लोग उससे सलाह लेते हैं। उसका हालचाल पूछते हैं। उसके स्वास्थ्य की चिंता करते हैं। उसके आसपास बैठते हैं। उसके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।

लेकिन जिस क्षण उसकी साँसें बंद हो जाती हैं, उसी क्षण उसके आसपास के संबंधों का स्वरूप भी बदलने लगता है।

कल तक जिस व्यक्ति से पूछा जाता था कि आज क्या खाना है, कहाँ जाना है, कौन-सा निर्णय लेना है, आज उसी के बारे में पूछा जाने लगता है कि उसकी बैंक की पासबुक कहाँ है, कौन-सी जमीन किसके नाम है, किस अलमारी में कागज रखे हैं और उसने किसे कितना पैसा दिया है।

यह परिवर्तन कभी धीरे-धीरे होता है, कभी इतनी तेजी से कि मृत्यु का समाचार और संपत्ति का हिसाब लगभग एक ही समय पर परिवार के भीतर प्रवेश कर जाते हैं।

मैं यह नहीं कहता कि प्रत्येक परिवार ऐसा होता है। अनेक परिवारों में मृत्यु के बाद सच्चे प्रेम, त्याग और सहयोग के असाधारण उदाहरण मिलते हैं।

लेकिन यह भी एक कटु सच्चाई है कि संपत्ति के लिए परिवारों में होने वाले विवाद कभी-कभी इतने तीखे हो जाते हैं कि मृतक की चिता भी उन विवादों को कुछ समय के लिए शांत नहीं कर पाती।

तब मेरे मन में एक विचित्र कल्पना जन्म लेती है।

क्या हो, यदि विज्ञान एक ऐसी मशीन बना दे जिसे किसी मनुष्य के मस्तिष्क से जोड़ते ही उसके भीतर चल रहे सारे विचार एक पर्दे पर दिखाई देने लगें?

न केवल वे विचार जिन्हें वह बोल रहा है, बल्कि वे भी जिन्हें वह स्वयं दूसरों से छिपाना चाहता है।

मन में उठती प्रत्येक आशंका, प्रत्येक इच्छा, प्रत्येक तुलना, प्रत्येक ईर्ष्या, प्रत्येक पछतावा और प्रत्येक स्वार्थ—सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगे।

मैं कल्पना करता हूँ कि ऐसी एक मशीन मेरे पास है।

मैं उसे लेकर उस घर में पहुँचता हूँ जहाँ परिवार के एक बुजुर्ग मुखिया का अभी-अभी निधन हुआ है।

देखना चाहता हूँ कि मृत्यु के बाद से लेकर श्मशान घाट पर चिता जलने तक मनुष्य के मस्तिष्क में आखिर क्या-क्या चलता है।

और जो दृश्य मेरी कल्पना में उभरता है, वह मुझे भीतर तक विचलित कर देता है।

मृत्यु का पहला क्षण : आँसू और विचारों की दो समानांतर धाराएँ

घर में एक वृद्ध पिता ने अंतिम साँस ली है।

कुछ देर पहले तक डॉक्टर को बुलाया जा रहा था। दवाएँ दी जा रही थीं। ऑक्सीजन लगाई जा रही थी। परिवार के सदस्य बेचैनी से उनके आसपास खड़े थे।

फिर डॉक्टर ने धीरे से कह दिया—अब ये नहीं रहे।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

पत्नी फूट-फूटकर रोने लगी। बड़े बेटे की आँखों से आँसू निकल पड़े। छोटा बेटा पिता के चरणों में बैठ गया। बेटी ने उनके हाथों को पकड़ लिया।

हर तरफ रोने की आवाजें हैं।

यदि हम केवल आँखों से देखें, तो यह एक दुख में डूबे परिवार का दृश्य है।

लेकिन अब मैं अपनी काल्पनिक मशीन चालू करता हूँ।

सबसे पहले बड़े बेटे के मस्तिष्क से उसे जोड़ता हूँ।

उसके मन में पिता की स्मृतियाँ चल रही हैं।

बचपन में पिता का कंधों पर बैठाकर मेला दिखाना, स्कूल में प्रवेश कराना, पहली नौकरी लगने पर प्रसन्न होना—सब कुछ याद आ रहा है।

वह सचमुच दुखी है।

लेकिन अचानक स्मृतियों के बीच एक दूसरा विचार प्रवेश करता है।

पिताजी ने पिछले महीने जो जमीन बेची थी, उसका पैसा कहाँ रखा होगा? क्या छोटे भाई को मालूम है?

कुछ क्षण बाद फिर पिता की स्मृति आ जाती है।

काश! मैं कल उनसे थोड़ी देर और बात कर लेता।

फिर दूसरा विचार—

कहीं उन्होंने छोटे भाई के नाम कोई कागज तो नहीं कर दिया?

मैं हैरान रह जाता हूँ।

एक ही मन में पिता के लिए प्रेम भी है और उनकी संपत्ति के बँटवारे की चिंता भी।

आँसू भी वास्तविक हैं और स्वार्थ भी वास्तविक है।

मनुष्य का मन कितना विचित्र है! वह एक ही क्षण में किसी को खोने का दुख और उसके पीछे छूट गई संपत्ति को पाने की संभावना महसूस कर सकता है।

अब मशीन छोटे बेटे के मस्तिष्क से जोड़ता हूँ।

वह पिता के पैरों के पास बैठा है।

उसकी आँखें लाल हैं।

उसके भीतर विचार चल रहा है—

मैंने पिताजी की कितनी सेवा की। अस्पताल मैं ले गया। रात-रात भर मैं जागा। बड़े भैया तो कभी समय से पहुँचे ही नहीं। अब संपत्ति बराबर बाँटने की बात करेंगे। क्या मेरी सेवा का कोई मूल्य नहीं?

इसके बाद उसे याद आता है कि कुछ दिन पहले उसने पिता से ऊँची आवाज में बात की थी।

उसका मन भर आता है।

पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। उस दिन ऐसा नहीं बोलना चाहिए था।

फिर वही विचार—

लेकिन यदि सब कुछ बराबर बँटा, तो मेरे साथ अन्याय होगा।

मैं समझ नहीं पाता कि यह व्यक्ति स्वार्थी है, दुखी है या अपने मन में न्याय की कोई अलग परिभाषा लेकर बैठा है।

शायद तीनों बातें एक साथ सच हैं।

यही मनुष्य की जटिलता है।

हम अपने स्वार्थ को बहुत बार न्याय का नाम दे देते हैं।

जो हमें मिलना चाहिए, उसके समर्थन में हमारे पास अनेक तर्क होते हैं। लेकिन जो दूसरे को मिलना चाहिए, उसके लिए हमारा मन उतनी उदारता से तर्क नहीं खोजता।

पत्नी का मन : संपत्ति नहीं, जीवन के खाली हो जाने का भय

अब मैं मशीन उस वृद्धा से जोड़ता हूँ, जिसका पति अभी-अभी संसार छोड़कर गया है।

वह रो रही है।

उसके मन में विवाह के शुरुआती दिन हैं।

संघर्ष के वर्ष हैं।

बच्चों का जन्म है।

घर बनाने के लिए किए गए त्याग हैं।

पति से हुई नाराजगियाँ हैं, जो अब अचानक छोटी लगने लगी हैं।

वह सोच रही है—

इतने वर्षों तक साथ रहे। कभी सोचा नहीं था कि एक दिन इस कमरे में अकेली रह जाऊँगी।

फिर उसके मन में एक और चिंता आती है।

अब मैं कहाँ रहूँगी? बड़े बेटे के साथ या छोटे के साथ? क्या बहुएँ मुझे अपने साथ रखना चाहेंगी?

उसका मन काँप उठता है।

घर तो इनके नाम हो जाएगा। कहीं मुझे अपने ही घर में पराया न समझा जाने लगे।

यहाँ मुझे समझ आता है कि मृत्यु के बाद संपत्ति की चिंता हमेशा लालच से पैदा नहीं होती।

कभी वह असुरक्षा से पैदा होती है।

जिस स्त्री ने वर्षों तक घर सँभाला, जिसके हाथों से परिवार का भोजन बना, जिसने पति के साथ सुख-दुख साझा किए, संभव है कि उसी को वृद्धावस्था में अपने रहने की जगह की चिंता सताने लगे।

यह कैसी विडंबना है?

एक ओर वह अपने पति को खोने का शोक मना रही है, दूसरी ओर उसे डर है कि कहीं पति की मृत्यु के साथ घर में उसका अपना स्थान भी न बदल जाए।

जिस घर को स्त्री ने जीवन भर अपना माना, उसी घर में बुढ़ापे की सुरक्षा को लेकर उसका भय हमारे पारिवारिक संबंधों की गहरी परीक्षा है।

बेटी का मन : क्या पिता का प्यार बराबर था, लेकिन अधिकार नहीं?

अब मशीन बेटी के मस्तिष्क पर लगाता हूँ।

वह पिता का हाथ पकड़कर रो रही है।

उसके मन में बचपन की स्मृतियाँ हैं।

पिता उसे स्कूल छोड़ने जाते थे।

परीक्षा में अच्छे अंक आने पर मिठाई लाते थे।

विवाह के समय उनकी आँखें नम हो गई थीं।

वह सोच रही है—

पिताजी, आप इतनी जल्दी क्यों चले गए?

फिर अचानक एक पुरानी बात याद आती है।

कुछ महीने पहले भाइयों के बीच जमीन को लेकर चर्चा हुई थी।

उसे किसी ने बुलाया नहीं था।

उसके मन में विचार आता है—

क्या मैं इस घर की बेटी नहीं हूँ? क्या पिता की संपत्ति पर मेरा कोई अधिकार नहीं?

अगले ही क्षण वह स्वयं को डाँटती है।

अभी पिताजी की मृत्यु हुई है और मैं संपत्ति के बारे में सोच रही हूँ!

लेकिन फिर उसका मन प्रश्न करता है—

अधिकार के विषय में सोचना क्या पिता के प्रति प्रेम की कमी है?

मशीन के पर्दे पर एक नया सत्य दिखाई देता है।

हर संपत्ति-संबंधी विचार लालच नहीं होता।

कभी वह बराबरी की इच्छा होती है।

कभी उपेक्षा की पुरानी पीड़ा होती है।

कभी सम्मान पाने की आकांक्षा होती है।

और कभी सचमुच वह दूसरों से अधिक प्राप्त करने का लोभ भी होता है।

मनुष्य के मन को समझना इसलिए कठिन है कि एक जैसी दिखने वाली इच्छाओं के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं।

बहुओं और रिश्तेदारों के मन में क्या चल रहा है?

अब मैं परिवार के अन्य सदस्यों की ओर बढ़ता हूँ।

बड़ी बहू अतिथियों के लिए पानी और चाय की व्यवस्था कर रही है।

वह थकी हुई है।

कई दिनों से घर का काम बढ़ गया था।

ससुर की बीमारी के कारण पूरा परिवार परेशान था।

उसके मन में विचार आता है—

अब माँजी अकेली रह जाएँगी। उनकी देखभाल कौन करेगा?

फिर वह सोचती है—

कहीं माँजी को हमारे साथ ही रखने की बात न तय हो जाए। बच्चों की पढ़ाई, घर का काम, नौकरी—सब कैसे सँभलेगा?

इसके बाद दूसरा विचार उभरता है—

यदि सारी जिम्मेदारी हमारी होगी, तो संपत्ति का हिस्सा भी उसी के अनुसार होना चाहिए।

वह स्वयं को स्वार्थी नहीं समझ रही।

उसके मन में यह व्यावहारिक तर्क है।

छोटी बहू के मन में दूसरी बात चल रही है।

बड़े भैया और भाभी सारे कागज अपने पास रख लेंगे। हमें तो कुछ बताएँगे भी नहीं।

एक दूर का रिश्तेदार खड़ा है।

वह बार-बार कह रहा है—

“बहुत अच्छे आदमी थे। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।”

मैं मशीन उसके मस्तिष्क पर लगाता हूँ।

पर्दे पर विचार उभरता है—

इन्होंने मेरे पचास हजार रुपये देने थे। अब किससे माँगूँगा?

दूसरा रिश्तेदार सोच रहा है—

इनके जाने के बाद जमीन का विवाद जरूर होगा। देखना, दोनों भाई अलग हो जाएँगे।

एक तीसरा मन ही मन हिसाब लगा रहा है कि अंतिम संस्कार में कितना खर्च आएगा और कौन कितना योगदान देगा।

किसी को अपने घर लौटने की जल्दी है।

किसी को शाम की ट्रेन पकड़नी है।

किसी को अगले दिन कार्यालय पहुँचना है।

कोई भूखा है, लेकिन शोक के वातावरण में भोजन की बात करते हुए संकोच कर रहा है।

कोई वास्तव में बुजुर्ग के जीवन को याद कर रहा है।

किसी के मन में पुरानी नाराजगी है।

और कोई चुपचाप यह सोच रहा है कि इस परिवार के लोग अब एक-दूसरे से कैसे व्यवहार करेंगे।

मैं अनुभव करता हूँ कि शोकसभा में जितने मनुष्य उपस्थित हैं, उतने ही अलग-अलग मानसिक संसार भी उपस्थित हैं।

बाहर एक ही घटना है—किसी व्यक्ति की मृत्यु।

लेकिन भीतर प्रत्येक मनुष्य उस घटना को अपने संबंध, अनुभव, आवश्यकता, भय और स्वार्थ के अनुसार समझ रहा है।

अर्थी उठने से पहले : मन में उठता एक दूसरा हिसाब

अब मृतक को स्नान कराकर अंतिम संस्कार के लिए तैयार किया जा रहा है।

घर के भीतर रोने की आवाजें तेज हो गई हैं।

कोई फूल लेकर आया है।

कोई कफन का कपड़ा।

कोई गाड़ी की व्यवस्था कर रहा है।

कोई पंडितजी से बात कर रहा है।

बड़े बेटे के मन में आता है—

अलमारी की चाबी कहाँ है? अभी सब लोग घर में हैं। कहीं कोई महत्वपूर्ण कागज इधर-उधर न हो जाए।

छोटा बेटा सोचता है—

पिताजी की डायरी मुझे देखनी चाहिए। उसमें बैंक खातों की जानकारी लिखी रहती थी।

दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति संदेह जन्म लेने लगा है।

अभी किसी ने किसी पर आरोप नहीं लगाया।

अभी कोई झगड़ा नहीं हुआ।

लेकिन संदेह का बीज पड़ चुका है।

और यह बीज कभी-कभी संपत्ति से भी अधिक विनाशकारी सिद्ध होता है।

क्योंकि संपत्ति का बँटवारा हो सकता है।

लेकिन विश्वास एक बार टूट जाए, तो उसका पुनर्निर्माण बहुत कठिन होता है।

मैं सोचता हूँ—

क्या यह वही परिवार है जो कुछ घंटे पहले तक पिता को बचाने के लिए एकजुट था?

क्या मृत्यु इतनी जल्दी लोगों को बदल देती है?

या मृत्यु केवल उस स्वार्थ को उजागर कर देती है जो पहले से उनके मन में उपस्थित था?

संभवतः दोनों परिस्थितियाँ होती हैं।

मृत्यु नए भय और नई जिम्मेदारियाँ उत्पन्न करती है।

लेकिन वह पुरानी ईर्ष्या, तुलना और असंतोष को भी सतह पर ला सकती है।

श्मशान घाट : जहाँ चिता के साथ इच्छाएँ भी जलनी चाहिए थीं

अब अर्थी श्मशान घाट पहुँच चुकी है।

लोग कंधा दे रहे हैं।

मंत्र पढ़े जा रहे हैं।

लकड़ियाँ सजाई जा रही हैं।

किसी की आँखों में आँसू हैं।

कोई हाथ जोड़कर खड़ा है।

मैं अपनी मशीन लेकर वहाँ भी पहुँच जाता हूँ।

बड़े बेटे के मन में विचार आता है—

पिताजी ने छोटे भाई की दुकान खोलने में कितना पैसा लगाया था! अब वह बराबर हिस्से की बात करेगा।

छोटा बेटा सोचता है—

बड़े भैया को तो पहले ही शहर का मकान दिला दिया था। अब गाँव की जमीन भी चाहिए होगी।

बेटी सोच रही है—

अभी कुछ बोलना ठीक नहीं है। लेकिन क्या बाद में मेरी बात सुनी जाएगी?

एक रिश्तेदार सोच रहा है—

देखो, अभी तो सब चुप हैं। तेरहवीं के बाद असली विवाद शुरू होगा।

एक दूसरा मनुष्य, जो मृतक का पुराना मित्र है, चुपचाप खड़ा है।

उसकी आँखों में पानी है।

उसके मन में संपत्ति का कोई विचार नहीं।

उसे याद आ रहा है कि कठिन समय में इसी मित्र ने बिना माँगे उसकी सहायता की थी।

वह सोचता है—

अब किससे अपने मन की बात करूँगा?

मशीन के पर्दे पर पहली बार मुझे एक ऐसी पीड़ा दिखाई देती है जिसमें कोई आर्थिक गणना नहीं है।

वहाँ केवल खो देने का दुख है।

मैं कुछ देर उसी मन को पढ़ता रहता हूँ।

तभी पास से दो व्यक्तियों की धीमी आवाज सुनाई देती है।

वे संपत्ति के किसी पुराने विवाद पर चर्चा कर रहे हैं।

उनमें से एक कहता है—

“अब देखना, जमीन किसे मिलती है।”

मृतक कुछ ही दूरी पर चिता पर लेटा है।

उसका शरीर अग्नि को समर्पित किए जाने वाला है।

और उसके पीछे छूट गई जमीन का भविष्य जीवित लोगों की चिंता बन चुका है।

इस दृश्य में एक असहनीय विडंबना है।

जिस मनुष्य ने जीवन भर जमीन को अपना कहा, आज उसे जलाने के लिए भी उस जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा स्थायी रूप से नहीं मिल रहा।

उसकी चिता कुछ घंटों में बुझ जाएगी।

लेकिन उसी मनुष्य की संपत्ति को लेकर परिवार में उठने वाला विवाद संभव है वर्षों तक चलता रहे।

जिस धन को उसने जीवन भर सुरक्षित रखा, वह उसके साथ नहीं जा रहा।

लेकिन उसके पीछे बचे लोग उसी धन के लिए अपने संबंधों को असुरक्षित बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

क्या मनुष्य सचमुच इतना स्वार्थी है?

अब मैं अपनी काल्पनिक मशीन बंद कर देता हूँ।

मेरे सामने एक कठिन प्रश्न है।

क्या मनुष्य मूलतः स्वार्थी है?

या परिस्थितियाँ उसे स्वार्थी बना देती हैं?

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मनुष्य के भीतर अपनी सुरक्षा, भविष्य और हित की चिंता स्वाभाविक है।

वह अपने जीवन को सुरक्षित रखना चाहता है।

अपने बच्चों का भविष्य अच्छा बनाना चाहता है।

आर्थिक अभाव से बचना चाहता है।

इन इच्छाओं को अपने आप में अनैतिक नहीं कहा जा सकता।

लेकिन स्वार्थ की समस्या तब शुरू होती है जब अपनी आवश्यकताओं के सामने दूसरों की आवश्यकताएँ महत्वहीन हो जाती हैं।

जब अपने अधिकार की चिंता इतनी प्रबल हो जाती है कि दूसरे का न्यायसंगत अधिकार दिखाई नहीं देता।

जब पिता की मृत्यु का दुख पीछे छूट जाता है और उनके बैंक खाते की राशि मन का मुख्य विषय बन जाती है।

जब भाई का संबंध केवल संपत्ति के हिस्से से निर्धारित होने लगता है।

जब माँ की वृद्धावस्था की देखभाल से पहले यह गणना होने लगती है कि उन्हें अपने साथ रखने पर कितना आर्थिक लाभ या हानि होगी।

तब स्वाभाविक आत्महित नैतिक समस्या में बदल जाता है।

यहाँ एक और बात समझनी आवश्यक है।

मनुष्य अपने स्वार्थ को सामान्यतः स्वार्थ के रूप में नहीं देखता। वह उसके लिए कोई नैतिक औचित्य खोज लेता है।

बड़ा बेटा कहता है—मैं बड़ा हूँ, परिवार का उत्तरदायित्व मैंने निभाया है।

छोटा बेटा कहता है—मैंने माता-पिता की सबसे अधिक सेवा की है।

बेटी कहती है—मुझे बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए।

बहू कहती है—मैंने उनकी देखभाल की, मेरे श्रम का भी मूल्य होना चाहिए।

इन सभी बातों में कुछ न कुछ न्यायसंगत तत्व हो सकता है।

लेकिन समस्या तब होती है जब प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने योगदान को देखता है और दूसरे के योगदान को कम करके आँकता है।

मनुष्य की स्मृति भी अपने पक्ष में काम करने लगती है।

उसे अपने त्याग बहुत स्पष्ट याद रहते हैं।

दूसरों के त्याग उतने स्पष्ट नहीं दिखाई देते।

उसे अपने साथ हुए अन्याय याद रहते हैं।

लेकिन दूसरों के साथ किए गए अन्याय उसकी स्मृति में धुँधले पड़ जाते हैं।

इसीलिए संपत्ति का विवाद कई बार केवल पैसे का विवाद नहीं होता।

वह वर्षों से दबे हुए अपमान, तुलना, उपेक्षा और असंतोष का विस्फोट बन जाता है।

सबसे बड़ा विरोधाभास : जीवन भर प्रेम की अपेक्षा, मृत्यु के बाद संपत्ति की गणना

मुझे अक्सर लगता है कि वृद्ध माता-पिता अपने बच्चों से सबसे अधिक क्या चाहते हैं?

क्या केवल इतना कि वे उनका भोजन और दवा उपलब्ध करा दें?

क्या केवल इतना कि महीने में कुछ पैसे भेज दें?

नहीं।

बहुत बार उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता होती है अपने महत्व के बने रहने की।

वे चाहते हैं कि कोई उनसे बात करे।

उनकी राय पूछे।

उनकी छोटी-छोटी चिंताओं को सुने।

उन्हें यह अनुभव हो कि वे अब भी परिवार का हिस्सा हैं, केवल देखभाल की जिम्मेदारी नहीं।

लेकिन कभी-कभी परिवारों में बुजुर्गों की आर्थिक उपयोगिता और भावनात्मक महत्ता आपस में उलझ जाती हैं।

जब तक संपत्ति उनके नाम है, उनका निर्णय महत्वपूर्ण है।

जब तक उनके पास पेंशन है, उनकी आर्थिक उपस्थिति बनी रहती है।

जब तक वे किसी बच्चे की मदद कर सकते हैं, उनसे संपर्क बनाए रखने के अतिरिक्त कारण भी उपस्थित रहते हैं।

लेकिन जब उनकी आर्थिक उपयोगिता कम हो जाती है, तब संबंधों की वास्तविक गहराई सामने आने लगती है।

हालाँकि हर परिवार में ऐसा नहीं होता।

अनेक बेटे-बेटियाँ ऐसे भी हैं जो अपनी सुविधाएँ छोड़कर माता-पिता की सेवा करते हैं। कई परिवारों में संपत्ति का प्रश्न बहुत बाद में आता है और रिश्ते अधिक महत्वपूर्ण बने रहते हैं।

लेकिन जहाँ संबंधों का आधार मुख्यतः आर्थिक अपेक्षा हो, वहाँ वृद्ध व्यक्ति कभी-कभी स्वयं को एक मनुष्य से अधिक संपत्ति के संरक्षक की तरह अनुभव करने लगता है।

यह स्थिति अत्यंत दुखद है।

किसी पिता के लिए इससे बड़ी पीड़ा क्या होगी कि उसके जीवित रहने का महत्व धीरे-धीरे इस बात से जुड़ जाए कि उसके पास कितना धन शेष है?

एक और प्रश्न : क्या संपत्ति का लोभ केवल बच्चों में होता है?

यदि हमें वास्तव में मनुष्य के स्वार्थ का विश्लेषण करना है, तो केवल मृत्यु के बाद संपत्ति माँगने वाले बच्चों को दोषी ठहराकर रुकना उचित नहीं होगा।

कभी-कभी माता-पिता भी अपने जीवनकाल में संपत्ति को संबंधों पर नियंत्रण का साधन बना लेते हैं।

वे किसी एक संतान को अधिक देते हैं।

किसी को दंडित करने के लिए कम देते हैं।

कभी अपनी इच्छाओं का पालन करवाने के लिए संपत्ति देने या न देने की बात करते हैं।

कभी बेटियों के अधिकार की उपेक्षा करते हैं।

कभी जीवन भर यह स्पष्ट नहीं करते कि उनके जाने के बाद संपत्ति का न्यायपूर्ण प्रबंध किस प्रकार होना चाहिए।

उनके निधन के बाद यही अस्पष्टता विवाद का कारण बन जाती है।

इसलिए परिवारों में स्वार्थ का विश्लेषण करते समय हमें सभी पक्षों को देखना होगा।

धन के कारण केवल बच्चे ही नहीं बदलते।

कभी माता-पिता का व्यवहार भी धन के प्रभाव में बदल सकता है।

कभी भाई-बहन के संबंध बदलते हैं।

कभी पति-पत्नी के बीच अविश्वास उत्पन्न होता है।

कभी दूर के रिश्तेदार अवसर खोजने लगते हैं।

मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं।

लोभ, भय, असुरक्षा और अधिकार की इच्छा सभी उम्र के लोगों में अलग-अलग रूपों में दिखाई दे सकती है।

बाहर शोक, भीतर स्वार्थ : क्या यह पाखंड है?

यह प्रश्न बहुत कठिन है।

यदि कोई व्यक्ति पिता की मृत्यु पर रो रहा है और उसी समय संपत्ति के विषय में भी सोच रहा है, तो क्या उसका रोना झूठा है?

आवश्यक नहीं।

मनुष्य का मन किसी एक भावना के अनुसार नहीं चलता।

एक दुखी व्यक्ति को भूख भी लग सकती है।

वह थक भी सकता है।

उसे कार्यालय की चिंता भी हो सकती है।

वह अंतिम संस्कार के खर्च का हिसाब भी लगा सकता है।

और वह संपत्ति की सुरक्षा के विषय में भी सोच सकता है।

इन विचारों की उपस्थिति मात्र से उसका शोक असत्य नहीं हो जाता।

मन में किसी स्वार्थपूर्ण विचार का उठना और उस विचार के आधार पर स्वार्थपूर्ण व्यवहार करना दो अलग बातें हैं।

मनुष्य अनेक बार अपनी इच्छा के बिना भी असंगत या अप्रिय विचारों का अनुभव करता है।

नैतिकता की वास्तविक परीक्षा इस बात में होती है कि वह उन विचारों को पहचानकर आगे क्या करता है।

क्या वह अपने भाई के अधिकार को स्वीकार करता है?

क्या वह अपनी विधवा माँ की सुरक्षा सुनिश्चित करता है?

क्या वह अपनी बहन के साथ न्याय करता है?

क्या वह पिता की इच्छाओं और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से विचार करता है?

या अवसर देखकर दूसरे का हिस्सा दबाने की कोशिश करता है?

यहीं विचार और चरित्र के बीच अंतर सामने आता है।

लेकिन जानबूझकर शोक का प्रदर्शन करना, दूसरों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करना और भीतर ही भीतर संपत्ति हड़पने की योजना बनाना निश्चय ही नैतिक छल है।

जहाँ आँसू दूसरों के विश्वास को जीतने का साधन बन जाएँ, वहाँ शोक की गरिमा आहत होती है।

श्मशान घाट पर मनुष्य को क्या सीखना चाहिए था?

श्मशान एक ऐसा स्थान है जहाँ मनुष्य को अपने अस्तित्व की सीमाओं का सबसे प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है।

वहाँ धनी और निर्धन, प्रभावशाली और साधारण, शिक्षित और अशिक्षित—सबके शरीर अंततः मृत्यु की एक ही वास्तविकता के सामने उपस्थित होते हैं।

जिस व्यक्ति ने जीवन भर संपत्ति जुटाई, वह उसे अपने साथ नहीं ले जा सकता।

जिसने पद के कारण दूसरों पर अधिकार जमाया, उसके शरीर की अंतिम यात्रा में वह पद कोई विशेष सहायता नहीं कर सकता।

जिसने अपने सौंदर्य, शक्ति या प्रतिष्ठा पर गर्व किया, वह भी मृत्यु की अनिवार्यता से मुक्त नहीं है।

लेकिन क्या इस दृश्य को देखकर मनुष्य का स्वार्थ समाप्त हो जाता है?

प्रायः नहीं।

कभी-कभी चिता की आग बुझने से पहले ही उसके मन में संपत्ति की गणना फिर शुरू हो जाती है।

इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ में आती है।

मृत्यु का दर्शन करना और मृत्यु के अर्थ को अपने जीवन में स्वीकार करना दो अलग बातें हैं।

हम अनेक अंतिम संस्कारों में शामिल होते हैं।

अनेक बार कहते हैं कि संसार में कुछ स्थायी नहीं है।

अनेक बार सुनते हैं कि मनुष्य खाली हाथ आया था और खाली हाथ जाएगा।

फिर भी अपनी संपत्ति, प्रतिष्ठा और इच्छाओं को लेकर उसी प्रकार संघर्ष करते रहते हैं जैसे हमारा जीवन अनंत काल तक चलने वाला हो।

क्यों?

क्योंकि मृत्यु का ज्ञान बौद्धिक स्तर पर होना एक बात है।

उस ज्ञान के अनुसार अपनी इच्छाओं और व्यवहार को बदलना दूसरी बात।

मनुष्य मृत्यु को जानता है, लेकिन अक्सर अपने लिए उसे दूर की घटना मानकर जीता है।

और जब मृत्यु किसी निकट व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करती है, तब भी वह अपने भविष्य की चिंताओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता।

क्या धन मनुष्य को स्वार्थी बनाता है?

यह कहना आसान है कि धन ही सभी बुराइयों की जड़ है।

लेकिन इस निष्कर्ष से मैं सहमत नहीं हूँ।

धन जीवन की आवश्यकता है।

उससे भोजन, आवास, शिक्षा, चिकित्सा और सुरक्षा प्राप्त होती है।

वृद्धावस्था में आर्थिक आत्मनिर्भरता व्यक्ति की गरिमा की रक्षा कर सकती है।

धन के अभाव में भी परिवारों में गंभीर तनाव उत्पन्न होते हैं।

समस्या धन के अस्तित्व में नहीं, उसके प्रति मनुष्य के संबंध में है।

जब धन जीवन का साधन रहता है, तब वह उपयोगी होता है।

जब धन दूसरे मनुष्यों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, तब वह संबंधों के लिए संकट बन सकता है।

एक भाई यदि दूसरे के न्यायसंगत अधिकार को हड़पने के लिए वर्षों तक मुकदमा लड़ता है, तो संभव है कि मुकदमे में उसकी संपत्ति का बड़ा भाग खर्च हो जाए।

लेकिन फिर भी वह मुकदमा छोड़ना नहीं चाहता।

क्यों?

क्योंकि अब मामला केवल धन का नहीं रह गया।

उसमें अहंकार जुड़ गया है।

पराजय का भय जुड़ गया है।

बदला लेने की इच्छा जुड़ गई है।

यह साबित करने की आकांक्षा जुड़ गई है कि वह अपने भाई से कमजोर नहीं है।

इस प्रकार संपत्ति का विवाद धीरे-धीरे मनुष्य की पहचान और प्रतिष्ठा का प्रश्न बन सकता है।

कभी-कभी लोग संपत्ति पाने से अधिक इस बात पर अड़े रहते हैं कि दूसरा व्यक्ति उसे प्राप्त न कर सके।

जब मनुष्य अपने लाभ से अधिक दूसरे की हानि में संतोष खोजने लगे, तब स्वार्थ ईर्ष्या और प्रतिशोध का रूप धारण कर चुका होता है।

यदि मरने वाला व्यक्ति सब कुछ देख सकता तो?

अब मैं अपनी कल्पना को एक और दिशा में ले जाता हूँ।

मान लीजिए, केवल कल्पना के लिए, कि मृतक अपने अंतिम संस्कार के दौरान परिवार के भीतर चल रहे सभी विचार सुन सकता।

वह देखता कि उसका बड़ा बेटा हिसाब लगा रहा है।

छोटा बेटा अपने योगदान की गणना कर रहा है।

बेटी पुराने भेदभाव को याद कर रही है।

बहुएँ भविष्य की जिम्मेदारियों को लेकर चिंतित हैं।

पत्नी अकेलेपन से डर रही है।

कुछ रिश्तेदार संपत्ति के बँटवारे का अनुमान लगा रहे हैं।

और कोई पुराना मित्र केवल उसके चले जाने से दुखी है।

वह क्या सोचता?

शायद उसे अपने बच्चों पर क्रोध आता।

शायद वह कहता—

मैंने जीवन भर तुम लोगों के लिए परिश्रम किया। तुम लोगों को पढ़ाया, घर बनाया, संपत्ति जोड़ी। और आज जब मेरा शरीर सामने पड़ा है, तब भी तुम्हें जमीन और पैसे की चिंता है?

लेकिन कुछ देर बाद संभव है उसे अपना जीवन भी याद आए।

वह याद करे कि जब उसके अपने पिता की मृत्यु हुई थी, तब उसने भी संपत्ति के हिस्से की चिंता की थी।

उसने भी अपने भाई से कहा था कि तुम्हें पहले ही बहुत कुछ मिल चुका है।

उसने भी कभी अपनी बहन के हिस्से को महत्व नहीं दिया था।

उसने भी कुछ संबंधों को धन के आधार पर आँका था।

तब शायद वह चुप हो जाता।

क्योंकि उसे अनुभव होता कि जिन प्रवृत्तियों के लिए वह आज अपने बच्चों को दोष दे रहा है, उनमें से कुछ प्रवृत्तियाँ उसके अपने जीवन में भी रही थीं।

मनुष्य दूसरों के स्वार्थ को बहुत स्पष्ट देखता है, लेकिन अपने स्वार्थ को प्रायः परिस्थितियों की विवशता समझ लेता है।

यही आत्मपरीक्षण की सबसे कठिन अवस्था है।

क्या स्वार्थ से मुक्ति संभव है?

मेरे विचार से मनुष्य को पूरी तरह स्वार्थरहित बनाने की कल्पना व्यावहारिक नहीं है।

प्रत्येक मनुष्य के भीतर आत्मरक्षा और अपने हित की चिंता किसी न किसी रूप में बनी रहती है।

लेकिन उसके भीतर सहानुभूति, त्याग, सहयोग और न्याय की भावना भी विकसित हो सकती है।

प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य के मन में स्वार्थपूर्ण विचार कभी आएँगे या नहीं।

प्रश्न यह है कि वह अपने स्वार्थ को कितनी सीमा तक नियंत्रित कर सकता है।

क्या वह अपने हिस्से की चिंता करते हुए दूसरे का अधिकार सुरक्षित रख सकता है?

क्या वह संपत्ति की बात करने के लिए उचित समय और सम्मानजनक तरीका चुन सकता है?

क्या वह यह समझ सकता है कि परिवार की वृद्ध विधवा की सुरक्षा केवल आर्थिक हिसाब का विषय नहीं, मानवीय कर्तव्य भी है?

क्या माता-पिता अपने जीवनकाल में संपत्ति के संबंध में स्पष्ट और न्यायपूर्ण व्यवस्था करके अनावश्यक विवादों की संभावना कम कर सकते हैं?

क्या परिवार में इतनी पारदर्शिता और विश्वास विकसित हो सकता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद रिश्तेदारों को एक-दूसरे से कागज छिपाने की आवश्यकता न महसूस हो?

ये प्रश्न छोटे लग सकते हैं, लेकिन इनका संबंध मनुष्य के चरित्र से है।

संपत्ति का न्यायपूर्ण प्रबंधन केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है।

वह परिवार की नैतिक परिपक्वता की भी परीक्षा है।

अब मैं मशीन अपने ही मस्तिष्क पर लगाता हूँ

इतनी देर तक मैं अपनी काल्पनिक मशीन से दूसरों के विचार पढ़ता रहा।

बड़े बेटे का मन देखा।

छोटे बेटे का मन देखा।

बेटी, बहू, पत्नी और रिश्तेदारों के मन देखे।

कहीं प्रेम मिला।

कहीं ईर्ष्या।

कहीं भय।

कहीं लोभ।

कहीं असुरक्षा।

कहीं वास्तविक करुणा।

और कहीं दूसरों से अधिक प्राप्त करने की छिपी हुई आकांक्षा।

लेकिन तभी मेरे भीतर एक प्रश्न उठता है।

क्या मैं स्वयं इन प्रवृत्तियों से पूरी तरह मुक्त हूँ?

मैंने अपने जीवन में कितनी बार दूसरों की उपलब्धियों से अपनी तुलना की होगी?

कितनी बार अपने हित को उचित और दूसरे के हित को अनुचित समझा होगा?

कितनी बार अपने त्याग को याद रखा होगा, लेकिन दूसरों के त्याग को कम महत्व दिया होगा?

कितनी बार किसी संबंध में अपनी अपेक्षाओं को प्रेम का नाम दिया होगा?

कितनी बार अपने भीतर उठी ईर्ष्या को न्याय की भावना समझ लिया होगा?

अब मुझे अपनी ही बनाई मशीन से डर लगने लगता है।

दूसरों के मन को पढ़ना आसान लग रहा था।

अपने मन को पढ़ना कठिन हो गया।

मैं सोचता हूँ कि यदि यह मशीन वास्तव में होती और हर मनुष्य के भीतर के विचार सार्वजनिक कर देती, तो संभव है समाज के अनेक सम्मानित चेहरे अपनी ही दृष्टि में असहज हो जाते।

लेकिन शायद हम एक-दूसरे के प्रति अधिक विनम्र भी हो जाते।

क्योंकि तब हमें पता चलता कि मनुष्य केवल अच्छा या बुरा नहीं है।

उसके भीतर अनेक विरोधी प्रवृत्तियाँ एक साथ रहती हैं।

वह प्रेम करता है और ईर्ष्या भी करता है।

वह त्याग कर सकता है और अपने अधिकार को लेकर कठोर भी हो सकता है।

वह किसी के लिए सचमुच रो सकता है और उसी क्षण अपने भविष्य के बारे में भी सोच सकता है।

वह दूसरे की मृत्यु से विचलित हो सकता है, लेकिन जीवन की आवश्यकताओं और अपनी इच्छाओं से मुक्त नहीं हो पाता।

मनुष्य की त्रासदी केवल यह नहीं कि वह स्वार्थी है। उसकी बड़ी त्रासदी यह भी है कि वह अपने स्वार्थ को पहचानने में अक्सर असफल रहता है।

और शायद नैतिक विकास की शुरुआत इसी पहचान से होती है।

उपसंहार : चिता पर कौन जलता है और पीछे क्या बचता है?

अंततः चिता जलती है।

कुछ घंटों बाद अग्नि शांत हो जाती है।

लोग अपने-अपने घर लौटने लगते हैं।

किसी को अगले दिन नौकरी पर जाना है।

किसी को बच्चों की परीक्षा की चिंता है।

किसी को घर का खर्च सँभालना है।

किसी को संपत्ति के कागज देखने हैं।

किसी को वकील से सलाह लेनी है।

और कोई ऐसा भी है जो घर लौटकर मृतक की खाली कुर्सी को देखता है और रो पड़ता है।

इस अंतिम दृश्य में मुझे मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई दिखाई देती है।

एक ही मृत्यु के अनेक अर्थ हो सकते हैं।

किसी के लिए पिता का जाना जीवन का सबसे बड़ा भावनात्मक आघात है।

किसी के लिए आर्थिक सुरक्षा का समाप्त होना।

किसी के लिए नई जिम्मेदारियों की शुरुआत।

किसी के लिए पुराने विवाद का फिर खुल जाना।

और किसी के लिए संपत्ति प्राप्त करने की संभावना।

इसलिए मनुष्य को केवल उसके मन में उठे एक विचार से पूरी तरह समझ लेना संभव नहीं।

लेकिन यह भी सच है कि कुछ लोग स्वार्थ के प्रभाव में अपनी मानवीय संवेदना को इतना कमजोर कर लेते हैं कि उन्हें मृत्यु की गरिमा तक याद नहीं रहती।

संपत्ति के लिए भाइयों का लड़ना दुखद है।

लेकिन पिता की चिता के पास खड़े होकर संपत्ति के लिए लड़ना उससे भी अधिक दुखद है।

क्योंकि उस क्षण मनुष्य के सामने जीवन की नश्वरता का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित होता है।

फिर भी यदि वह अपने लोभ और अहंकार को थोड़ी देर के लिए भी नियंत्रित नहीं कर पाता, तो यह उसके भीतर की नैतिक अपरिपक्वता को उजागर करता है।

मैं यह नहीं कहता कि मृत्यु के बाद संपत्ति का प्रश्न उठना ही नहीं चाहिए।

संपत्ति का प्रबंधन आवश्यक है।

उत्तराधिकार का न्यायपूर्ण निर्धारण आवश्यक है।

परिवार के आश्रित सदस्यों की सुरक्षा आवश्यक है।

लेकिन इन सभी कार्यों के लिए मनुष्य को अपनी संवेदना खोने की आवश्यकता नहीं है।

पिता की संपत्ति में हिस्सा माँगना गलत नहीं है। पिता की मृत्यु को उस हिस्से पर कब्जा करने का अवसर समझ लेना गलत है।

इसी प्रकार अपने अधिकार की रक्षा करना अनुचित नहीं।

लेकिन दूसरे के अधिकार को दबाकर स्वयं को अधिक योग्य उत्तराधिकारी मान लेना अनुचित है।

मृत्यु हमें कम-से-कम इतना अवश्य सिखा सकती है कि जीवन के सभी संबंधों को धन के हिसाब में नहीं बाँधा जा सकता।

मैं अपनी काल्पनिक मशीन को अब हमेशा के लिए बंद कर देना चाहता हूँ।

क्योंकि मुझे लगता है कि मनुष्य के भीतर चलने वाला प्रत्येक विचार जान लेना आवश्यक भी नहीं है।

कुछ विचार क्षणिक होते हैं।

कुछ भय से पैदा होते हैं।

कुछ दुख की अवस्था में आते हैं और चले जाते हैं।

कुछ इच्छाएँ मनुष्य स्वयं भी अनुचित मानकर रोक देता है।

इसलिए किसी व्यक्ति को उसके मन में उठने वाले प्रत्येक विचार के आधार पर दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।

लेकिन उसके व्यवहार का नैतिक मूल्यांकन अवश्य होना चाहिए।

क्योंकि अंततः चरित्र का निर्माण केवल उन विचारों से नहीं होता जो हमारे भीतर उठते हैं, बल्कि उन निर्णयों से होता है जो हम उन विचारों के बाद लेते हैं।

और तब मुझे अपने आरंभिक प्रश्न का एक उत्तर दिखाई देता है।

यदि मनुष्य के मस्तिष्क को पढ़ने वाली मशीन सचमुच बन जाए, तो शायद हमें दूसरों के भीतर जितना स्वार्थ दिखाई देगा, उससे कहीं अधिक हम अपने भीतर छिपे स्वार्थ को देखकर विचलित होंगे।

शायद इसीलिए प्रकृति ने मनुष्य के विचारों को दूसरों से छिपाकर रखा है।

लेकिन अपने विचारों को स्वयं से छिपाकर रखना हमारे लिए आवश्यक नहीं है।

हम अपने भीतर उठते लोभ, ईर्ष्या, भय और असुरक्षा को पहचान सकते हैं।

उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास कर सकते हैं।

और अपने व्यवहार को अधिक न्यायपूर्ण बना सकते हैं।

यही मनुष्य के नैतिक विकास की संभावना है।

अंत में मैं फिर उस चिता की ओर देखता हूँ, जिसकी अग्नि अब लगभग बुझ चुकी है।

मृतक का शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो रहा है।

उसके नाम की जमीन अब भी वहीं है।

बैंक में जमा धन भी वहीं है।

मकान भी वहीं खड़ा है।

अलमारी में रखे आभूषण भी वहीं हैं।

केवल वह व्यक्ति नहीं रहा जिसने जीवन भर इन सबको अपना माना था।

अब दूसरे लोग उन्हें अपना बनाने की चिंता में हैं।

एक दिन वे भी नहीं रहेंगे।

उनके बाद कोई तीसरी पीढ़ी उसी संपत्ति को लेकर अपने अधिकार का दावा करेगी।

और यह क्रम चलता रहेगा।

इसी विचार के साथ मेरे मन में एक अंतिम प्रश्न उठता है—

मनुष्य जीवन भर संपत्ति को अपना बनाता रहता है, लेकिन क्या वह कभी यह समझ पाता है कि संपत्ति का स्वामित्व अस्थायी है और उसके लिए तोड़े गए संबंधों की पीड़ा कहीं अधिक स्थायी हो सकती है?

शायद सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस धन को हम आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए जोड़ते हैं, वही धन कभी-कभी उन्हीं पीढ़ियों के बीच अविश्वास और वैमनस्य का कारण बन जाता है।

और जिस पिता ने जीवन भर अपने बच्चों को एक साथ रखने का प्रयास किया, उसकी मृत्यु के बाद कभी-कभी उसी की संपत्ति उन्हें अलग कर देती है।

तब लगता है—

चिता पर केवल एक मनुष्य का शरीर जलता है, लेकिन उसके आसपास खड़े लोगों के भीतर कई बार प्रेम, विश्वास और रिश्तों की संवेदनाएँ भी धीरे-धीरे राख होने लगती हैं।

यह आवश्यक नहीं कि हर परिवार की कहानी ऐसी ही हो।

लेकिन जहाँ ऐसा होता है, वहाँ मृत्यु से अधिक दुखद वह मानवीय पतन है जो मृत्यु के बाद दिखाई देता है।

और शायद इसीलिए हमें मनुष्य के मस्तिष्क को पढ़ने वाली किसी मशीन की नहीं, बल्कि अपने ही मन को ईमानदारी से देखने वाले विवेक की आवश्यकता है।

क्योंकि मृत्यु यह नहीं बताती कि जाने वाला कितना धन छोड़ गया। वह जीवित बचे लोगों के सामने यह प्रश्न रखती है कि वे उस मनुष्य की स्मृति के साथ कितना न्याय करेंगे।

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अंतिम विचार

जिस पिता के जीवित रहते उसके बच्चे उसकी उँगली पकड़कर चलना सीखते हैं, यदि उसी पिता की मृत्यु के बाद वे उसकी संपत्ति के लिए एक-दूसरे का गला पकड़ने लगें, तो प्रश्न केवल धन के लोभ का नहीं रह जाता। प्रश्न यह हो जाता है कि मनुष्य ने जीवन भर संबंधों से वास्तव में सीखा क्या?

लेखक:: रुद्र प्रताप सिंह आईएएस retd 

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