मानव स्वभाव :: एक विरोधावास
कल जिन पर हँसते थे, आज उन्हीं जैसे क्यों हो जाते हैं?
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हाल ही में विमान यात्रा के दौरान नेटवर्क नहीं था। बैठे-बैठे बचपन की एक बात याद आई। पिता जी और दादा जी के कुछ काम मुझे बड़े अजीब लगते थे। वे छोटी-छोटी बातों पर सावधानी बरतते, खर्च का हिसाब रखते, किसी काम के परिणाम के बारे में पहले से सोचते और कभी एक ही बात बार-बार समझाते। उस समय मैं मन ही मन हँसता था। आज अपने व्यवहार पर ध्यान देता हूँ, तो पाता हूँ कि उनमें से कई काम मैं भी करने लगा हूँ।
यह अनुभव केवल मेरे परिवार का नहीं है। गाँव हो या शहर, बहुत से लोग जीवन में किसी न किसी दिन यह कहते मिलते हैं—“पहले मुझे यह आदत समझ नहीं आती थी; अब मैं खुद ऐसा करता हूँ।” आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या उम्र के साथ मनुष्य बदल जाता है, या जीवन उसे उन परिस्थितियों तक पहुँचा देता है जिनमें उसके बड़े पहले से खड़े थे?
शायद दोनों बातें सच हैं।
बचपन में हम किसी व्यक्ति का व्यवहार देखते हैं, उसके पीछे की पूरी जिम्मेदारी नहीं। घर का बड़ा बार-बार दरवाजे का ताला देखे तो बच्चे को वह अनावश्यक चिंता लग सकती है। घर की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथ आए तो वही काम सावधानी लगने लगता है। बचत पहले कंजूसी लगती है; आर्थिक कठिनाई का अनुभव होने पर उसका दूसरा अर्थ समझ में आता है। काम कई बार वही रहता है, लेकिन उसे देखने वाली हमारी जगह बदल जाती है।
मनोविज्ञान हमें यह भी बताता है कि हमारा व्यवहार केवल सोच-समझकर लिए गए निर्णयों से नहीं बनता। हम दूसरों को देखकर भी जीने के तरीके सीखते हैं। घर में किसी ने तनाव को कैसे संभाला, असहमति पर कैसे बोला, बच्चों से कैसे पेश आया—ये दृश्य मन में रह जाते हैं। बड़े होकर हम कुछ तरीकों को जानबूझकर अपनाते हैं; कुछ अनजाने में हमारे व्यवहार में उतर आते हैं। अध्ययनों में पालन-पोषण के कुछ तरीकों की पीढ़ियों के बीच निरंतरता देखी गई है। इसका यह अर्थ नहीं कि हर व्यक्ति अपने माता-पिता जैसा ही बनेगा। सीखे हुए व्यवहार को पहचाना और बदला भी जा सकता है।
यहाँ से विचार का एक कठिन पक्ष सामने आता है। बचपन में कोई व्यक्ति अपने घर या गाँव में नशा करने वालों को देखकर कह सकता है, “मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा।” फिर जीवन में किसी मोड़ पर वह स्वयं नशे का सहारा लेने लगे। कोई अपने साथ हुई मारपीट को गलत मानता था, लेकिन आगे चलकर गुस्से में अपने बच्चे को मार देता है। ये दोनों व्यवहार एक जैसे कारणों से नहीं पैदा होते; नशे में आदत और निर्भरता भी भूमिका निभा सकती है। फिर भी दोनों उदाहरण हमें सावधान करते हैं: किसी काम को गलत समझना और उस काम से स्वयं को बचाए रखना, अलग क्षमताएँ हैं।
इससे भी अधिक विचित्र बात तब होती है जब मनुष्य अपने और दूसरे के लिए अलग-अलग कसौटियाँ बना लेता है। अपनी शराब पीने पर कहता है, “मैं तनाव में था”; दूसरे को पीते देखकर कहता है, “उसका चरित्र खराब है।” अपने बच्चे को मारने पर कहता है, “मैं उसे सुधार रहा था”; दूसरे को वही करते देखकर कहता है, “कितना निर्दयी आदमी है।”
मनुष्य दूसरे की गलती को उसके चरित्र का प्रमाण मान लेता है, और अपनी उसी गलती को परिस्थितियों का परिणाम।
हम अपने भीतर चल रही चिंता, थकान, गुस्से और इरादे को जानते हैं। दूसरे के भीतर क्या चल रहा है, यह प्रायः नहीं जानते। इसलिए अपने काम की व्याख्या करते समय कारण गिनाते हैं और दूसरे का मूल्यांकन करते समय उसके दिखने वाले काम पर फैसला सुना देते हैं। यह प्रवृत्ति हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में समान रूप से काम नहीं करती, लेकिन अपने जीवन में इसे पहचानना उपयोगी है।
यह समझ किसी गलत काम को माफ करने के लिए नहीं है। तनाव नशे से होने वाली हानि मिटा नहीं देता। बच्चे के भविष्य की चिंता उसे मारने का औचित्य नहीं बन जाती। परिस्थिति किसी व्यवहार का कारण समझा सकती है; वह अपने आप उसे सही नहीं ठहराती।
उम्र के साथ एक और बदलाव आ सकता है। समय की कीमत और रिश्तों का महत्व पहले से अलग महसूस होने लगता है। जो बातें पहले मामूली या उबाऊ लगती थीं—परिवार के साथ बैठना, नियमित दिनचर्या रखना, पुरानी यादों को सँजोना—वे अधिक अर्थपूर्ण लग सकती हैं। यह सबके जीवन की अनिवार्य कहानी नहीं है, पर बहुत लोगों के अनुभव में ऐसा परिवर्तन दिखाई देता है।
फिर क्या हमें अपने बड़ों की हर बात अपनानी चाहिए? बिल्कुल नहीं। उनकी मितव्ययिता उपयोगी हो सकती है, पर हर खर्च से डरना जरूरी नहीं। उनकी जिम्मेदारी से सीख सकते हैं, पर उनकी कठोरता दोहराना आवश्यक नहीं। विरासत का अर्थ केवल आदतों को आगे बढ़ाना नहीं है; उसका अर्थ यह भी है कि हम पूछें—इनमें क्या बचाना है और क्या यहीं रोक देना है?
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए दो तरह की ईमानदारी चाहिए। पहली, अपने बड़ों को केवल उन कामों से न आँकें जिन पर कभी हमें हँसी आती थी; उनकी परिस्थितियों को भी समझने का प्रयास करें। दूसरी, जब वही काम अपने भीतर दिखाई दे, तो स्वयं को तुरंत सही घोषित न करें। अपने आप से पूछें: “यदि यही काम कोई दूसरा करता, तो मैं उसके बारे में क्या कहता?”
शायद उम्र का सबसे मूल्यवान उपहार अपने बड़ों जैसा हो जाना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर समझते हुए अपने व्यवहार को भी अधिक साफ नजर से देख पाना है। हम उनकी अच्छी बातों को आगे ले जा सकते हैं और जिन बातों से कभी हमें चोट पहुँची थी, उनका सिलसिला अपने पास समाप्त कर सकते हैं।
कल हम किसी पर हँसे थे। आज कभी स्वयं पर मुस्कुरा सकते हैं। लेकिन उस मुस्कान के बाद यदि थोड़ा आत्मपरीक्षण भी आ जाए, तो अनुभव सचमुच समझ में बदल सकता है।
लेखक :: रुद्र प्रताप सिंह
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