NCLT का खुला खेल



 
**एनसीएलटी और दिवालिया प्रक्रिया: बड़े कर्ज का खेल**
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       पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक नई तरह की वित्तीय अनियमितता तेजी से उभरी है। कंपनियाँ बैंकों से सैकड़ों और हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लेती हैं, फिर उसे वापस नहीं करतीं। मामला राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में जाता है। दिवालिया प्रक्रिया के तहत कंपनी बहुत कम कीमत पर बिक जाती है, बैंकों को भारी नुकसान होता है, और कई मामलों में कंपनी दोबारा उन्हीं लोगों या उनके करीबियों के हाथ में चली जाती है।

       यह प्रक्रिया कागजों पर कानूनी है, लेकिन व्यवहार में इसमें कई पक्ष शामिल होकर ऐसा खेल खेलते हैं जिससे कुछ लोग बहुत बड़ा लाभ कमाते हैं और नुकसान सार्वजनिक धन यानी आम नागरिक को होता है।

#### नुकसान किसका हो रहा है?

       सबसे बड़ा नुकसान **सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों** और उनके माध्यम से **आम करदाता** का होता है।  

         जब कोई कंपनी 1000 करोड़ का कर्ज लेकर वापस नहीं करती और प्रक्रिया में सिर्फ 50–100 करोड़ ही वसूल हो पाते हैं, तो बाकी 900 करोड़ का नुकसान बैंक को उठाना पड़ता है। ये बैंक ज्यादातर सरकारी होते हैं। उनका पैसा आम नागरिक की बचत और करों से आता है। यानी बड़े कर्जदार का डिफॉल्ट आखिरकार आम आदमी की जेब पर भारी पड़ता है।

        दूसरा नुकसान **ईमानदार व्यापारियों** और **छोटी-मध्यम कंपनियों** का होता है। उन्हें संदेश जाता है कि नियम बड़े लोगों के लिए अलग हैं। जो मेहनत से व्यापार करते हैं और समय पर कर्ज चुकाते हैं, वे हतोत्साहित होते हैं।

#### फायदा किसे हो रहा है?

मुख्य लाभार्थी होते हैं:

       **मूल प्रमोटर और उनके करीबी**: कई मामलों में कंपनी बहुत सस्ते में ऐसे लोगों के पास चली जाती है जो मूल मालिक के परिवार, रिश्तेदार या व्यावसायिक सहयोगी होते हैं। कर्ज से मुक्त होकर वे दोबारा कंपनी पर नियंत्रण पा लेते हैं।  
-        **बड़े पूंजीपति और उद्योग समूह**: कभी-कभी बड़े उद्योगपति सस्ती कीमत पर अच्छी संपत्तियाँ और प्लांट खरीद लेते हैं।  
- **मध्यस्थ और बिचौलिए**: बोली प्रक्रिया, मूल्यांकन और बातचीत में मध्यस्थ सक्रिय रहते हैं। वे दोनों पक्षों से कमीशन कमाते हैं।  
- **कुछ पेशेवर और अधिकारी**: दिवालिया पेशेवर, मूल्यांकनकर्ता, वकील और कुछ बैंक अधिकारी तथा संबंधित विभागों के लोग इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जहाँ पारदर्शिता कम होती है, वहाँ व्यक्तिगत लाभ की गुंजाइश पैदा होती है।

#### खेल में कौन-कौन शामिल होते हैं?

        यह खेल अकेले कर्जदार नहीं खेलता। इसमें कई स्तर के लोग शामिल होते हैं:

- **कंपनी के प्रमोटर**:                        जानबूझकर या गलत प्रबंधन से कर्ज लेकर डिफॉल्ट करते हैं।  
- **बैंक के कुछ अधिकारी**: कर्ज देते समय या बाद में निगरानी में ढील बरतने के आरोप लगते रहे हैं।  
- **दिवालिया पेशेवर और मूल्यांकनकर्ता**: संपत्ति का मूल्यांकन और प्रक्रिया चलाने में उनकी भूमिका केंद्रीय होती है। कम मूल्यांकन होने से कंपनी सस्ती बिकती है।  
       **मध्यस्थ (बिचौलिए)**: बोली लगाने वाले पक्षों और प्रक्रिया से जुड़े लोगों के बीच पुल का काम करते हैं।  
-         **राजनीतिक पहुँच वाले लोग**: बड़े मामलों में राजनीतिक संरक्षण या प्रभाव के आरोप भी लगते रहे हैं, जिससे प्रक्रिया प्रभावित होती है।  
- **नए खरीदार**: जो अक्सर मूल प्रमोटर से जुड़े होते हैं या बड़े पूंजीपति होते हैं।

      ये सभी पक्ष एक तरह के **अनौपचारिक नेटवर्क** में काम करते हैं। हर किसी को कुछ-न-कुछ लाभ पहुँचता है — चाहे वह कमीशन हो, सस्ती संपत्ति हो, या कर्ज से मुक्ति। नुकसान अकेला बैंक और आम नागरिक उठाता है।

#### प्रक्रिया की कमजोरियाँ जो खेल को आसान बनाती हैं
        संपत्ति का मूल्यांकन कई बार वास्तविक मूल्य से काफी कम होता है।  
- बोली प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा नहीं हो पाती।  
- संबंधित पक्षों (Related Parties) द्वारा खरीद पर रोक होने के बावजूद, रिश्तेदारों और सहयोगी कंपनियों के जरिए रास्ता निकाल लिया जाता है।  
- पूरी प्रक्रिया जटिल और तकनीकी होती है, इसलिए आम नागरिक और मीडिया के लिए इसे समझना और निगरानी करना मुश्किल होता है।

#### सार

      एनसीएलटी और दिवालिया प्रक्रिया अपने मूल उद्देश्य में गलत नहीं थी। फँसे हुए कर्ज को सुलझाने का विचार सही था। लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया कई बार बड़े कर्जदारों, उनके करीबियों, मध्यस्थों और कुछ पेशेवरों के लिए लाभ का माध्यम बन गई है।  

       **नुकसान** होता है सार्वजनिक बैंकों और आम करदाता का।  
- **फायदा** होता है मूल प्रमोटरों, उनके सहयोगियों, बड़े पूंजीपतियों और मध्यस्थों का।  
- **खेल** में अधिकारी, पेशेवर, बिचौलिए और कभी-कभी राजनीतिक पहुँच वाले लोग शामिल होते हैं।

       जब 1000 करोड़ की कंपनी 10-20 करोड़ में बिकती है और बैंकों को भारी नुकसान होता है, तो यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं रह जाती। यह सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर हस्तांतरण का मामला बन जाता है — जहाँ नुकसान समाज उठाता है और लाभ एक छोटे समूह तक पहुँचता है।

         “सुविधा का चक्रव्यूह” अब सिर्फ पुराने तरीके की रिश्वत तक सीमित नहीं रहा। वह कानूनी और वित्तीय प्रक्रियाओं के अंदर भी समाहित हो गया है।

लेखक:: रुद्र प्रताप सिंह 

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