आह या बददुआ
किसी की बददुआ मत लो — पीड़ित हृदय की आह से बचना ही सच्चा धर्म है
मनुष्य जीवन में धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता है, लेकिन इन सबसे अधिक मूल्यवान है—ऐसा जीवन जीना जिसमें हमारी वजह से किसी निर्दोष की आँख में आँसू न आएँ।
लगभग सभी प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराएँ अलग-अलग भाषा में एक समान शिक्षा देती हैं: कमजोर, असहाय, गरीब, वृद्ध, अनाथ, पीड़ित अथवा अपने ऊपर निर्भर व्यक्ति के साथ अन्याय मत करो। क्योंकि जिसके पास प्रतिकार करने की शक्ति नहीं होती, उसकी पीड़ा बहुत गहरी होती है।
इसी गहरी पीड़ा को लोकभाषा में हम कभी-कभी “बददुआ” या “आह” कहते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह आवश्यक नहीं कि किसी के मुँह से निकले शब्द कोई अलौकिक शक्ति बनकर हमें दंड देने आ जाएँगे। इसका अधिक गहरा अर्थ यह है कि हम ऐसा कर्म ही क्यों करें जिससे किसी मनुष्य का हृदय हमारे कारण इतना दुखी हो जाए कि वह हमारे लिए बुरा सोचने पर विवश हो?
हिंदू परंपरा — परपीड़ा से बचना
भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा में अहिंसा, दया, करुणा, सेवा और परोपकार को अत्यंत महत्व दिया गया है। तुलसीदास ने अत्यंत सरल शब्दों में कहा—
“परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।”
अर्थात् दूसरों का हित करने जैसा कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई अधर्म नहीं।
इस दृष्टि से सबसे बड़ी सावधानी यह नहीं होनी चाहिए कि “मुझे किसी की बददुआ न लग जाए”, बल्कि यह होनी चाहिए कि मेरे व्यवहार से किसी निर्दोष व्यक्ति को पीड़ा ही न पहुँचे।
इस्लाम — मज़लूम की पुकार से सावधान
इस्लामी शिक्षा में ज़ुल्म अर्थात अन्याय को गंभीर माना गया है। विशेष रूप से मज़लूम—जिसके साथ अन्याय हुआ हो—की दुआ या पुकार के प्रति सावधान रहने की शिक्षा मिलती है।
इसका बहुत सुंदर नैतिक संदेश है: शक्तिशाली व्यक्ति अपनी शक्ति का उपयोग कमजोर को दबाने के लिए न करे।
जिसके पास धन, पद या अधिकार अधिक है, उसकी जिम्मेदारी भी अधिक है।
ईसाई धर्म — जो सबसे कमजोर है, उसकी उपेक्षा मत करो
ईसा मसीह की शिक्षाओं में गरीबों, भूखों, बीमारों, उपेक्षितों और समाज के कमजोर लोगों के प्रति करुणा पर विशेष बल मिलता है।
यहाँ भी मूल संदेश वही है—मनुष्य की महानता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह अपने से शक्तिशाली व्यक्ति के सामने कैसा व्यवहार करता है; बल्कि इससे कि वह अपने से कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है।
बौद्ध धर्म — किसी जीव के दुःख का कारण मत बनो
बौद्ध दर्शन में करुणा और अहिंसा अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बुद्ध की शिक्षा हमें अपने कर्म, वाणी और विचारों के प्रति सजग करती है।
क्रोध में बोला गया एक कठोर शब्द भी किसी व्यक्ति के मन में वर्षों तक रह सकता है। इसलिए केवल शारीरिक हिंसा से बचना पर्याप्त नहीं; वाणी से होने वाली हिंसा से भी बचना आवश्यक है।
जैन धर्म — अहिंसा का अत्यंत व्यापक स्वरूप
जैन दर्शन अहिंसा को बहुत व्यापक अर्थ देता है। केवल किसी को मारना ही हिंसा नहीं है; अनावश्यक रूप से किसी जीव को कष्ट पहुँचाना भी हिंसा की भावना से जुड़ सकता है।
यह हमें अत्यंत संवेदनशील जीवन-दृष्टि देता है—हमारे सुख की कीमत किसी दूसरे की अनावश्यक पीड़ा नहीं होनी चाहिए।
सिख धर्म — सेवा और समानता
सिख परंपरा सेवा, समानता, ईमानदार श्रम और दूसरों के साथ बाँटकर जीवन जीने पर बल देती है। जाति, धन या सामाजिक हैसियत के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा समझना इस भावना के विपरीत है।
सेवा हमें यह याद दिलाती है कि जो आज देने की स्थिति में है, वह कल लेने की स्थिति में भी हो सकता है।
तो किन लोगों की “बददुआ” से विशेष रूप से बचना चाहिए?
मेरी दृष्टि में इसका उत्तर किसी अंधविश्वास में नहीं, बल्कि नैतिकता में छिपा है।
उस हर व्यक्ति की आह से बचिए जिसके साथ आप अन्याय कर सकते थे, लेकिन न्याय कर सकते थे।
विशेष रूप से—
माता-पिता और वृद्धों को जानबूझकर अपमानित या असहाय न छोड़ें।
गरीब व्यक्ति की मजबूरी का अनुचित लाभ न उठाएँ।
किसी कर्मचारी या मजदूर की मेहनत का उचित पैसा न रोकें।
विधवा, अनाथ, दिव्यांग या असहाय व्यक्ति के अधिकार को न दबाएँ।
स्त्री या पुरुष—किसी की भावनात्मक, आर्थिक अथवा सामाजिक मजबूरी का शोषण न करें।
बच्चों के कोमल मन को अपमान, भय और हिंसा से घायल न करें।
अपने ऊपर विश्वास करने वाले व्यक्ति को धोखा न दें।
किसी भूखे का भोजन और किसी जरूरतमंद का उचित अधिकार न छीनें।
किसी निर्दोष व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाकर उसकी प्रतिष्ठा नष्ट न करें।
और सबसे महत्वपूर्ण—जिस व्यक्ति के पास आपके अन्याय का उत्तर देने की शक्ति नहीं है, उसके प्रति और अधिक संवेदनशील रहें।
बददुआ से डरें या अपने कर्म से?
यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि हम केवल इस डर से अच्छा व्यवहार करते हैं कि सामने वाले की बददुआ लग जाएगी, तो हमारी नैतिकता भी एक प्रकार का लेन-देन बन जाती है।
सच्ची नैतिकता यह है—
“मैं किसी को इसलिए पीड़ा नहीं दूँगा क्योंकि उसकी पीड़ा स्वयं में गलत है—चाहे उसकी बददुआ मुझे लगे या न लगे।”
यही धर्म की ऊँची अवस्था है।
किसी गरीब को इसलिए भोजन देना कि उसका आशीर्वाद मिलने से हमारा व्यापार बढ़ जाएगा, एक प्रकार की अपेक्षा है। लेकिन किसी भूखे को इसलिए भोजन देना कि उसकी भूख हमें भीतर से विचलित करती है—यह करुणा है।
आशीर्वाद कमाने से पहले आँसू रोकिए
जीवन में लोग अक्सर संतों और धार्मिक व्यक्तियों से आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर जाते हैं। यह उनकी श्रद्धा का विषय है और उसका सम्मान होना चाहिए।
लेकिन शायद जीवन का एक और बड़ा आशीर्वाद हमारे बहुत निकट उपलब्ध है—
वृद्ध माता-पिता की संतुष्टि, मजदूर को समय पर मिली मजदूरी, भूखे को मिला भोजन, अपमानित व्यक्ति को मिला सम्मान, कमजोर को मिला न्याय और रोते हुए मनुष्य के चेहरे पर हमारे कारण लौटी मुस्कान।
संभव है यही जीवन की सबसे बड़ी दुआ हो।
अंततः प्रश्न यह नहीं होना चाहिए—
“किसकी बददुआ मुझे लग सकती है?”
प्रश्न यह होना चाहिए—
“मेरे कारण किसी को बददुआ देने की आवश्यकता ही क्यों पड़े?”
यदि मनुष्य इस एक प्रश्न को अपने आचरण का आधार बना ले, तो उसे बददुआ से डरने की आवश्यकता बहुत कम रह जाएगी।
क्योंकि धर्म का सर्वोच्च रूप भय नहीं, करुणा है; पूजा का सर्वोच्च रूप कर्मकांड नहीं, मानवता है; और आशीर्वाद पाने का सबसे सरल मार्ग शायद यही है कि—
जहाँ तक संभव हो, हमारे कारण किसी निर्दोष हृदय को पीड़ा न पहुँचे।
लेखक
रुद्र प्रताप सिंह
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