SIR की विश्वसनीयता



मतदाता सूची का सवाल: सुधार, चूक या जवाबदेही का संकट?
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         भारत जैसे लोकतंत्र में मतदान केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। मतदाता सूची में नाम होना उस नागरिक के राजनीतिक अधिकार के प्रयोग की पहली शर्त है। इसलिए जब मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटने की खबरें आती हैं, और उसके कुछ ही समय बाद निर्वाचन आयोग स्वयं अपनी प्रक्रिया में परिवर्तन करता है, तो एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—यदि पहले अपनाई गई व्यवस्था सही थी, तो उसे इतनी जल्दी बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यही प्रश्न आज Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है।

SIR की शुरुआत बिहार में जून 2025 में हुई थी। इसके बाद नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए और NDA ने 243 में से 202 सीटें जीतीं; इनमें BJP ने 89 सीटें जीतीं।  लेकिन केवल इस क्रम—पहले SIR, फिर चुनाव और फिर किसी गठबंधन की जीत—से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण ने चुनाव परिणाम तय किया। ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए निर्वाचन क्षेत्रवार यह प्रमाण आवश्यक होगा कि गलत तरीके से हटाए गए वास्तविक मतदाताओं की संख्या कितनी थी, उनका वितरण कैसा था और उससे परिणाम प्रभावित होने की वास्तविक संभावना क्या थी।

लेकिन इससे एक दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न समाप्त नहीं होता: SIR की प्रक्रिया स्वयं कितनी पारदर्शी और त्रुटिरहित थी?

सितंबर 2026 में The Indian Express की एक विस्तृत पड़ताल सामने आई। उसके अनुसार निर्वाचन आयोग के दो अन्य सदस्यों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने लगभग दस महीनों के दौरान कम-से-कम 14 मौकों पर विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियाँ या असहमति दर्ज की थीं। इनमें Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और ECINet प्रणाली से जुड़े विषय शामिल थे। आयोग ने इन नोट्स के अस्तित्व को नकारा नहीं, लेकिन उसका कहना है कि मतभिन्नता निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा थी और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

इस मामले का एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण पक्ष Form 6 है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले इस वैधानिक फॉर्म के ऑनलाइन संस्करण में SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। आयोग के दो सदस्यों ने कथित रूप से इस बदलाव को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए इसे हटाने की बात कही थी। सितंबर के अंतिम सप्ताह में निर्वाचन आयोग ने उन राज्यों में यह अतिरिक्त घोषणा हटा दी जहाँ SIR समाप्त हो चुका था।

यहीं नागरिक का प्रश्न और गंभीर हो जाता है। यदि अतिरिक्त घोषणा आवश्यक और विधिसम्मत थी, तो बाद में उसे हटाया क्यों गया? और यदि उसे हटाना उचित था, तो पहले उससे प्रभावित आवेदकों तथा मतदाताओं पर उसके प्रभाव का स्वतंत्र आकलन होना चाहिए या नहीं?

इसी तरह “13 करोड़ नाम काटे जाने” की चर्चा को भी सावधानी से समझना आवश्यक है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार SIR के दौरान देश के 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की draft electoral rolls से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर हुए। यह कहना कि अंतिम रूप से 13 करोड़ वैध मतदाताओं का मतदान अधिकार समाप्त हो गया, उपलब्ध आंकड़ों से सिद्ध नहीं होता, क्योंकि draft roll के बाद claims, objections, verification और पुनः inclusion की प्रक्रिया होती है। फिर भी संख्या इतनी बड़ी है कि यह स्वयं गंभीर परीक्षण की मांग करती है—इनमें मृत, स्थानांतरित और duplicate मतदाता कितने थे, और जीवित तथा योग्य लेकिन गलती से छूटे मतदाता कितने थे?

इस प्रश्न को और महत्वपूर्ण बनाता है निर्वाचन आयोग का 29 सितंबर 2026 का नया निर्देश। आयोग ने उन 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने का आदेश दिया है जहाँ SIR समाप्त हो चुका है, ताकि मतदाता सूची से “left out” रह गए योग्य लोगों की पहचान कर उन्हें फिर से जोड़ने में सहायता की जा सके। BLO को घर-घर जाकर ऐसे मतदाताओं की पहचान और Form 6 भरवाने में मदद करने को कहा गया है।

यह सुधार स्वागतयोग्य प्रशासनिक कदम हो सकता है, लेकिन इसके साथ एक स्वाभाविक जवाबदेही का प्रश्न भी पैदा होता है: यदि योग्य मतदाताओं को खोजकर वापस जोड़ने के लिए अब विशेष अभियान की आवश्यकता पड़ रही है, तो मूल प्रक्रिया में वे छूटे कैसे?

कानून भी इस विषय पर एक महत्वपूर्ण सुरक्षा देता है। Representation of the People Act और संबंधित नियमों में मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले उचित प्रक्रिया, तथ्य-जाँच और जहाँ आवश्यक हो वहाँ सुनवाई का अवसर महत्वपूर्ण माना गया है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधानिकता को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही उसने अपने फैसले में notice, enquiry और hearing जैसे procedural safeguards को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि draft roll में नाम न होना अपने-आप अंतिम deletion नहीं माना जा सकता।

हाल के दिनों में Bombay High Court की Goa Bench के सामने भी कुछ चिंताजनक मामले आए। छह लोगों के नाम मतदाता सूची से हटने के मामले में अदालत ने Election Commission से पूछा कि यह “glitch” कैसे हुआ। दूसरे मामले में उसने Form 8 को सीधे अस्वीकार किए जाने पर सवाल उठाया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार Bombay High Court ने SIR को समाप्त नहीं किया है, लेकिन उसने व्यक्तिगत मतदाताओं के साथ प्रक्रिया के स्तर पर हुई गड़बड़ियों पर आयोग से स्पष्टीकरण अवश्य माँगा है।

इसी बीच निर्वाचन आयोग ने ECINet प्रणाली की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने, कुछ मामलों में BLO द्वारा घर जाकर दस्तावेज एकत्र करने और दिल्ली तथा महाराष्ट्र में समय-सीमा बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए हैं। 26 सितंबर की आयोग की आधिकारिक प्रेस-नोट में स्पष्ट कहा गया कि नोटिस प्राप्त कुछ मतदाताओं से दस्तावेज उनके घर से लिए जाएंगे और सामान्यतः उन्हें ERO कार्यालय में व्यक्तिगत सुनवाई के लिए आने की आवश्यकता नहीं होगी।

इसलिए विवाद को केवल दो अतियों में बाँटना उचित नहीं होगा—न यह कहना पर्याप्त है कि “इतने नाम हटे, इसलिए चुनाव अवश्य प्रभावित हुआ”, और न यह कहना कि “प्रक्रिया वैधानिक थी, इसलिए कोई गंभीर समस्या हो ही नहीं सकती।”

आज आवश्यक प्रश्न कुछ और हैं।

क्या प्रत्येक हटाए गए नाम का कारण सार्वजनिक रूप से audit किया जा सकता है? कितने नाम मृत्यु, migration और duplicate registration के कारण हटे? कितने पात्र नागरिकों के नाम गलती से छूटे? कितने लोगों को प्रभावी notice मिला? कितनों की सुनवाई हुई? कितनों को बाद में दोबारा जोड़ा गया? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इन आँकड़ों को विधानसभा क्षेत्र और बूथ स्तर तक ऐसे जारी किया जा सकता है कि राजनीतिक दल, पत्रकार, न्यायपालिका और सामान्य नागरिक स्वयं उनकी जाँच कर सकें?

Chief Election Commissioner को व्यक्तिगत रूप से “दोषी” घोषित करना न्यायिक या विधिक निष्कर्ष के बिना उचित नहीं होगा। लेकिन किसी संवैधानिक पदाधिकारी की जवाबदेही का प्रश्न उठाना भी लोकतंत्र-विरोधी नहीं है। Indian Express की रिपोर्ट में दर्ज आंतरिक आपत्तियाँ, प्रक्रियाओं में बाद के बदलाव, ECINet की समीक्षा और “left-out voters” को दोबारा खोजने का विशेष अभियान—ये सभी ऐसे तथ्य हैं जिन पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण माँगा जाना स्वाभाविक है। निर्वाचन आयोग का पक्ष भी दर्ज रहना चाहिए कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए और SIR की वैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है।

2 अक्टूबर 2026 को भी विभिन्न छात्र और नागरिक समूहों ने निर्वाचन आयोग तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध प्रदर्शन किए और उनके इस्तीफे की मांग की। ये राजनीतिक और नागरिक समूहों की मांगें हैं, स्वयं किसी दोष का प्रमाण नहीं। लेकिन आंदोलन यह अवश्य दर्शाते हैं कि मतदाता सूची को लेकर भरोसे का प्रश्न अब केवल तकनीकी प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है।

लोकतंत्र में अंतिम प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा दल जीता और कौन हारा। असली प्रश्न इससे पहले आता है—क्या प्रत्येक योग्य नागरिक को बिना अनावश्यक बाधा के अपना मत डालने का अवसर मिला?

मतदाता सूची में मृत या duplicate नाम हटना आवश्यक है। लेकिन किसी जीवित और पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना केवल “डेटा की गलती” नहीं है; चुनाव के समय वह गलती उसके लोकतांत्रिक अधिकार को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए SIR पर बहस का सबसे उपयोगी रास्ता आरोप और बचाव से आगे जाकर पूर्ण डेटा, स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण, प्रत्येक deletion का कारण और प्रभावी अपील व्यवस्था सार्वजनिक करने की मांग से निकलता है।

क्योंकि निर्वाचन आयोग पर जनता का विश्वास किसी सरकार या विपक्ष की संपत्ति नहीं है।

वह भारतीय लोकतंत्र की सामूहिक पूँजी है।

लेखक:: रुद्र प्रताप सिंह आईएएस retd 

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