परहित सरिस धर्म नही कोई

परहित सरिस धर्म नहीं कोई

परोपकार: धर्म, दर्शन और आत्मबोध की सर्वोच्च साधना

मनुष्य जब इस संसार में जन्म लेता है, तब वह केवल अपने लिए जीना जानता है। भूख लगे तो रोता है, आवश्यकता हो तो माँगता है, पीड़ा हो तो सहायता चाहता है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि जीवन का प्रारंभ "मैं" से होता है।

किन्तु जीवन की परिपक्वता तब आरम्भ होती है, जब "मैं" धीरे-धीरे "हम" में बदलने लगता है।

यही परिवर्तन मनुष्य को पशु से अलग करता है और यही परिवर्तन धर्म का वास्तविक आरम्भ है।

इसी सत्य को गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यंत सरल शब्दों में कहा—

"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

यह केवल एक काव्य-पंक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता का नैतिक संविधान है।

धर्म का अर्थ कभी भी केवल पूजा-पद्धति नहीं रहा। यदि धर्म केवल मंदिर जाने का नाम होता, तो संसार में इतने धार्मिक लोग होने के बाद भी हिंसा, छल, घृणा और अन्याय क्यों होते?

धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर ऐसी चेतना जगाना है, जिससे वह दूसरे के सुख में अपना सुख और दूसरे के दुःख में अपना दुःख अनुभव कर सके।

परहित क्यों सर्वोच्च धर्म है?

इस ब्रह्माण्ड को ध्यान से देखिए।

सूर्य प्रतिदिन प्रकाश देता है, लेकिन कभी किसी से मूल्य नहीं माँगता।

नदियाँ निरंतर बहती हैं। वे यह नहीं पूछतीं कि कौन किस धर्म, जाति या भाषा का है।

वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते। उनकी छाया में बैठने वाले से कोई परिचय नहीं पूछा जाता।

पृथ्वी सबका भार समान रूप से उठाती है।

यदि प्रकृति का प्रत्येक तत्व केवल अपने लिए जीता, तो जीवन की संभावना ही समाप्त हो जाती।

प्रकृति हमें मौन भाषा में एक ही शिक्षा देती है—जीवन का अर्थ संग्रह नहीं, योगदान है।

परहित और आत्मा का संबंध

भारतीय दर्शन कहता है कि प्रत्येक जीव में एक ही चेतना विद्यमान है। यदि यह सत्य है, तो दूसरे का हित करना वास्तव में अपने ही व्यापक स्वरूप का हित करना है।

इसीलिए परोपकार कोई दान नहीं, बल्कि आत्मबोध की पहली सीढ़ी है।

जब मनुष्य किसी अजनबी के आँसू पोंछता है, तब वह केवल उसकी सहायता नहीं करता; वह अपने भीतर छिपी करुणा को भी जागृत करता है।

और करुणा जितनी बढ़ती है, अहंकार उतना ही छोटा होता जाता है।

सबसे बड़ा दान क्या है?

बहुत लोग समझते हैं कि धन देना ही सबसे बड़ा दान है।

धन का दान महत्त्वपूर्ण है, किन्तु उससे भी बड़ा दान है—समय देना, सम्मान देना, ज्ञान देना, क्षमा देना, विश्वास देना और आशा देना।

भूखा व्यक्ति केवल रोटी से नहीं, सम्मान से भी तृप्त होता है।

निराश व्यक्ति केवल सलाह से नहीं, सहानुभूति से भी जी उठता है।

कई बार एक स्नेहपूर्ण वाक्य, हजारों रुपये से अधिक मूल्यवान सिद्ध होता है।

परहित का सबसे बड़ा शत्रु

परोपकार का सबसे बड़ा शत्रु गरीबी नहीं, बल्कि संकीर्णता है।

जिस व्यक्ति का जीवन केवल "मेरा परिवार", "मेरा धन", "मेरा सम्मान" तक सीमित रह जाता है, उसका हृदय धीरे-धीरे छोटा होने लगता है।

और जिसका हृदय छोटा हो जाए, उसके लिए संसार भी छोटा हो जाता है।

वहीं जिसका हृदय विशाल हो जाता है, उसके लिए सम्पूर्ण मानवता अपना परिवार बन जाती है।

परहित का अभ्यास कैसे करें?

परोपकार किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा नहीं करता।

प्रतिदिन एक व्यक्ति की सहायता कीजिए।

किसी निराश व्यक्ति का मनोबल बढ़ाइए।

किसी बच्चे को शिक्षा दीजिए।

किसी वृद्ध का सम्मान कीजिए।

किसी पीड़ित की बात ध्यान से सुन लीजिए।

यदि कुछ भी संभव न हो, तो कम-से-कम किसी को दुःख न पहुँचाइए।

कई बार किसी को पीड़ा न देना भी बहुत बड़ा परोपकार होता है।

निष्कर्ष

जब मनुष्य इस संसार से विदा होता है, तब उसके साथ न धन जाता है, न पद, न प्रसिद्धि।

यदि कुछ शेष रह जाता है, तो लोगों की स्मृतियों में उसके द्वारा किया गया व्यवहार और उसका परहित।

इसलिए जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए—

"मैंने कितना कमाया?"

बल्कि यह होना चाहिए—

"मेरे कारण कितने लोगों के जीवन में आशा, मुस्कान और साहस आया?"

जिस दिन समाज का प्रत्येक व्यक्ति यह प्रश्न स्वयं से पूछने लगेगा, उस दिन धर्म को बचाने के लिए किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं होगी।

क्योंकि धर्म ग्रंथों में नहीं, मनुष्य के व्यवहार में जीवित रहता है।

और शायद इसी सत्य को तुलसीदास ने एक ही पंक्ति में अमर कर दिया—

"परहित सरिस धर्म नहीं कोई।"

जिस दिन यह वाक्य केवल हमारी वाणी में नहीं, बल्कि हमारे जीवन में उतर जाएगा, उसी दिन मनुष्य वास्तव में धार्मिक कहलाने का अधिकारी होगा।

लेखक 

रुद्र प्रताप सिंह 

Comments

Popular posts from this blog

व्यक्तित्व विकास@ अहंकार विश्लेषण

प्रेम की पराकाष्ठा

मृत्यु :: एक निरपेक्ष सत्य फिर भय क्यों?