सम्मान का महत्व
सम्मान : मनुष्य की सबसे सूक्ष्म भूख
सम्मान माँगने वाले और सम्मान के योग्य बनने वाले व्यक्ति का दार्शनिक विवेचन
— रुद्र प्रताप सिंह
यदि मनुष्य के जीवन की समस्त इच्छाओं को एक-एक करके हटाया जाए, तो अंत में जो अंतिम इच्छा बचती है, वह है—स्वीकृत होने की इच्छा। यही स्वीकृति जब समाज के माध्यम से व्यक्त होती है, तो उसे हम सम्मान कहते हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य सम्मान क्यों चाहता है। प्रश्न यह है कि वह सम्मान किससे चाहता है, किसलिए चाहता है और किस मूल्य पर चाहता है।
सम्मान की इच्छा मनुष्य के भीतर उतनी ही पुरानी है जितना उसका आत्मबोध। जिस दिन मनुष्य ने पहली बार स्वयं को दूसरे मनुष्यों से अलग पहचानना शुरू किया, उसी दिन उसने यह भी चाहा कि उसकी पहचान को स्वीकार किया जाए। यहीं से सम्मान की यात्रा आरम्भ हुई।
किन्तु सम्मान के साथ एक गहरी विडम्बना जुड़ी है।
सम्मान जितना आवश्यक है, उसका मोह उतना ही विनाशकारी है।
जो सम्मान जीवन को गरिमा देता है, वही सम्मान यदि अहंकार का भोजन बन जाए तो मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है।
यही कारण है कि संसार में दो प्रकार के लोग दिखाई देते हैं।
पहला वह, जो अपने जीवन को इतना श्रेष्ठ बनाने में लगा रहता है कि सम्मान स्वयं चलकर उसके द्वार पर आ जाता है।
दूसरा वह, जो जीवन भर सम्मान के पीछे दौड़ता रहता है, पर जितना दौड़ता है, सम्मान उतना ही उससे दूर चला जाता है।
यह प्रकृति का अद्भुत नियम है—
जिस वस्तु का पीछा किया जाता है, वह अक्सर दूर भागती है; और जिसके योग्य बना जाता है, वह स्वयं प्राप्त हो जाती है।
सम्मान भी इसी नियम का पालन करता है।
जो व्यक्ति सम्मान की याचना करता है, वह वस्तुतः दूसरों के निर्णयों का बंदी बन जाता है। उसका सुख लोगों की प्रशंसा पर निर्भर हो जाता है और उसका दुःख उनकी उपेक्षा पर। वह स्वयं का स्वामी नहीं रहता।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने सत्य, अपने कर्तव्य और अपने विवेक के प्रति निष्ठावान रहता है, उसके लिए सम्मान लक्ष्य नहीं, केवल एक उपफल होता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो सम्मान का संबंध समाज से कम और मनुष्य की चेतना से अधिक है।
जिस व्यक्ति ने स्वयं को स्वीकार नहीं किया, वह संसार से स्वीकृति माँगता रहेगा।
जिसने स्वयं को जान लिया, उसे संसार की स्वीकृति की आवश्यकता कम होती चली जाती है।
इसीलिए इतिहास में महान व्यक्तियों ने सम्मान कमाने का प्रयास नहीं किया; उन्होंने सत्य की खोज की। कभी-कभी समाज ने उन्हें सम्मान दिया, कभी उपहास किया, कभी दंड दिया। पर उनके मार्ग में कोई परिवर्तन नहीं आया।
यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद समझना आवश्यक है—
आत्मसम्मान और सम्मान में वही अंतर है जो सूर्य और चंद्रमा में है।
आत्मसम्मान अपने भीतर से प्रकाशित होता है।
दूसरों का सम्मान बाहर से आता है।
जो भीतर के सूर्य को जगा लेता है, वह बाहर के चंद्रमा के घटने-बढ़ने से विचलित नहीं होता।
मानव जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि लोग सम्मान को प्राप्त करना चाहते हैं, जबकि सम्मान वास्तव में त्याग का परिणाम है।
जिसने अपने अहंकार का त्याग किया...
जिसने अपने स्वार्थ का त्याग किया...
जिसने अपनी प्रशंसा की इच्छा का त्याग किया...
जिसने दूसरों को छोटा सिद्ध करने की प्रवृत्ति का त्याग किया...
उसी के भीतर वह आभा उत्पन्न होती है जिसे संसार सम्मान कहता है।
यह भी सत्य है कि कुछ लोग सम्मान नहीं चाहते, वे केवल अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं। उन्हें सम्मान नहीं, अधीनता चाहिए। उन्हें आदर नहीं, आज्ञाकारिता चाहिए। ऐसे लोगों के चारों ओर भीड़ तो होती है, लेकिन प्रेम नहीं होता। उनके सामने सिर झुकते हैं, पर हृदय नहीं झुकते।
सच्चा सम्मान वह है जिसमें सामने वाला व्यक्ति स्वतंत्र रहते हुए भी आपके प्रति आदर अनुभव करे।
सम्मान का सर्वोच्च रूप वह है जिसमें आपको अपने सम्मान का बोध भी न रहे।
जैसे वृक्ष फल लगने पर झुक जाता है...
जैसे नदी समुद्र तक पहुँचने के लिए नीचे बहती है...
वैसे ही महान व्यक्ति जितना ऊँचा उठता है, उतना ही विनम्र होता जाता है।
विनम्रता सम्मान का कारण नहीं, उसका स्वाभाविक परिणाम है।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि संसार आपको कितना सम्मान देता है।
प्रश्न यह है कि क्या आपकी आत्मा आपके जीवन का सम्मान करती है?
यदि उत्तर "हाँ" है, तो संसार का सम्मान बोनस है।
यदि उत्तर "नहीं" है, तो संसार का सम्मान भी भीतर की रिक्तता को नहीं भर सकता।
इसलिए सम्मान मत माँगिए।
स्वयं को इतना सत्य, इतना निर्मल और इतना करुणामय बना लीजिए कि सम्मान आपके पीछे चले, और आपको उसकी ओर देखने की भी आवश्यकता न पड़े।
क्योंकि अंततः सम्मान मनुष्य को नहीं मिलता—
सम्मान उसके चरित्र की सुगंध को मिलता है।
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