गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा
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“गुरु का सम्मान” और “गुरु के नाम पर व्यक्ति-पूजा या व्यवसाय” एक ही चीज़ नहीं हैं।

गुरु पूर्णिमा मूलतः आषाढ़ पूर्णिमा पर मनाई जाने वाली गुरु-शिष्य और ज्ञान-परंपरा के प्रति कृतज्ञता का अवसर है। हिंदू परंपरा में इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है और महर्षि वेदव्यास से जोड़ा जाता है। बौद्ध परंपरा में भी यही समय बुद्ध के सारनाथ में प्रथम उपदेश से जुड़ा माना जाता है। 

उपनिषदों में गुरु का महत्व स्पष्ट है, लेकिन “गुरु पूर्णिमा” नामक वार्षिक उत्सव और आज जैसी उसकी पूजा-पद्धति का स्पष्ट विधान प्रमुख प्राचीन उपनिषदों में नहीं मिलता। यह भेद बहुत महत्वपूर्ण है। तैत्तिरीय उपनिषद की प्रसिद्ध शिक्षा है—“आचार्यदेवो भव”, अर्थात आचार्य को अत्यंत आदर का स्थान दो। श्वेताश्वतर उपनिषद 6.23 में ईश्वर के साथ गुरु के प्रति भी गहरी श्रद्धा की बात आती है। 

लेकिन उपनिषदों की मूल भावना को केवल इतना समझ लेना कि “गुरु ने जो कहा वही अंतिम सत्य है और प्रश्न मत पूछो”, मुझे उचित व्याख्या नहीं लगती। उपनिषद स्वयं प्रश्न, संवाद और ज्ञान की खोज की महान परंपरा हैं। उनका गुरु वह है जो शिष्य को ज्ञान की ओर ले जाए, न कि उसे अपने व्यक्तित्व का आश्रित बना दे।

इसीलिए आज गुरु पूर्णिमा मनाने का अधिक सार्थक तरीका मेरे विचार से यह होगा: अपने माता-पिता, शिक्षक, आचार्य और जीवन में जिनसे भी वास्तविक ज्ञान मिला हो उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें; अच्छी पुस्तकों और ज्ञान-परंपरा का अध्ययन करें; और स्वयं से पूछें—“पिछले एक वर्ष में मैंने क्या सीखा और उससे मेरे आचरण में क्या परिवर्तन आया?”

और आपने जो “गुरुओं का बाजार” वाली बात कही, उसमें संतुलन जरूरी है। सभी आध्यात्मिक गुरु व्यावसायिक या शोषक नहीं हैं। लेकिन जहाँ गुरु पूर्णिमा का अर्थ बड़े चढ़ावे, महंगे उपहार, प्रचार, भीड़, चमत्कारों के दावे और व्यक्ति-पूजा बन जाए, वहाँ प्रश्न करना उचित है। जिस गुरु की प्रतिष्ठा शिष्य की स्वतंत्र बुद्धि को बढ़ाने के बजाय उसकी निर्भरता बढ़ाती है, वहाँ गुरु-परंपरा की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।

वास्तव में गुरु पूर्णिमा का सबसे सुंदर संदेश शायद यह है—गुरु की पूजा से अधिक महत्वपूर्ण गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना है। ज्ञान देने वाला गुरु यदि हमें प्रश्न करना, विवेक करना और स्वयं सत्य खोजने योग्य बना देता है, तो वही उसकी सबसे बड़ी गुरु-दक्षिणा है।

लेखक 
रुद्र प्रताप सिंह

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