इर्ष्या का शमन



         क्या आपने कभी सोचा है कि जब किसी की प्रगति हम देखते हैं या किसी के साथ अच्छा हुआ देखते हैं तो हमारे अंदर एक अव्यक्त रूप से भावना पैदा होती है जो ईर्ष्या की होती है। हम इसको कभी भी मानने को तैयार नहीं होते हैं कि हमें ईर्ष्या हो रही है ।यह ईर्ष्या कभी-कभीतो व्यक्त रूप में और कभी-कभी अव्यक्त रूप में होती है ।लेकिन यह हर मनुष्य के अंदर होती ईर्ष्या को हम आराम से सुधार सकते हैं इससे हमारे व्यक्तित्व के विकास में बहुत ही सहायता मिलेगी और हम एक अच्छे मनुष्य होने की तरफ अग्रसरित होंगे ।
      मनुष्य के भीतर अनेक भावनाएँ होती हैं—प्रेम, करुणा, दया, क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या। इनमें से ईर्ष्या एक ऐसी भावना है जो लगभग हर व्यक्ति के मन में कभी न कभी उत्पन्न होती है। अंतर केवल इतना है कि किसी में यह बहुत कम होती है और किसी में अधिक।

ईर्ष्या तब पैदा होती है जब हम किसी दूसरे व्यक्ति को अपने से अधिक सफल, अधिक सम्मानित, अधिक धनवान या अधिक सुखी देखते हैं। उस समय हमारे मन में यह विचार आता है कि "जो उसके पास है, वह मेरे पास क्यों नहीं है?" यही तुलना धीरे-धीरे ईर्ष्या का रूप ले लेती है।

वास्तव में ईर्ष्या का मूल कारण दूसरों की सफलता नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति असंतोष है। जब व्यक्ति अपने जीवन, अपनी उपलब्धियों और अपनी परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होता, तब वह दूसरों से तुलना करने लगता है। तुलना से असंतोष पैदा होता है और असंतोष से ईर्ष्या।

ईर्ष्या का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह व्यक्ति की शांति छीन लेती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे की खुशी देखकर दुखी होता है और दूसरे के दुख में प्रसन्नता अनुभव करता है। ऐसी स्थिति में उसका ध्यान अपने विकास से हटकर दूसरों पर केंद्रित हो जाता है। परिणामस्वरूप उसका अपना विकास रुक जाता है।

    धार्मिक ग्रंथों में भी ईर्ष्या को मनुष्य का बड़ा शत्रु बताया गया है। ईर्ष्या मन को अशांत करती है, संबंधों को कमजोर करती है और व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देती है।
     हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम अपने जीवन को 100 वर्ष या उससे आगे का मन कर चलते हैं जबकि एक क्षण का भरोसा नहीं यदि हम इस तथ्य को मन से और अंदर से स्वीकार कर ले तो शायद हमारे अंदर भगवान के प्रति कृतज्ञ का भाव और तेजी से उत्पन्न होगा हमें 24 घंटे से अंदर का 24 घंटे से अधिक का जीवन जीने की इच्छा नहीं करनी चाहिए पिछले 24 घंटे में जो हमको मिला है उसके लिए भगवान को धन्यवाद देने से हमको संबल मिलता है और यह भी स्पष्ट होता है कि यदि किसी को कुछ मिला है उसकी कुछ प्रकट हुई है या कुछ सकारात्मक उसके साथ हुआ है तो वह भगवान की उसको दिन है और उसे हमे स्वीकार करना चाहएको क्योंकि वह भगवान की देन है 
इर्ष्या दूर करने के लिए यदि हम थोड़ा सा प्रयास करें तो निश्चित रूप से हमारे अंदर मानवता का विकास होगा जो समाज के लिए भी बहुत योगदान पूर्ण होगा

1. तुलना करना बंद करें

हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, भाग्य, कर्म और जीवन यात्रा अलग होती है। इसलिए अपनी तुलना किसी दूसरे से करना उचित नहीं है।

2. कृतज्ञता का अभ्यास करें

प्रतिदिन कुछ मिनट यह सोचें कि ईश्वर ने आपको क्या-क्या दिया है। जो व्यक्ति अपने जीवन के प्रति आभारी होता है, उसके मन में ईर्ष्या कम होती है।

3. दूसरों की सफलता में प्रसन्न होना सीखें

जब कोई व्यक्ति सफल हो, तो मन से उसे शुभकामनाएँ दें। प्रारंभ में यह कठिन लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत मन को निर्मल बनाती है।

4. स्वयं के विकास पर ध्यान दें

दूसरों की ओर देखने के बजाय अपनी योग्यता, ज्ञान और चरित्र को बेहतर बनाने का प्रयास करें।

5. ईश्वर से जुड़ें

प्रार्थना, ध्यान, सत्संग और धार्मिक चिंतन मन को शांत करते हैं। शांत मन में ईर्ष्या लंबे समय तक टिक नहीं सकती।

एक छोटी सी सीख

यदि आपके पड़ोसी के घर में दीपक जलता है तो उसका प्रकाश आपके घर का अंधकार नहीं बढ़ाता। उसी प्रकार किसी दूसरे की सफलता आपकी असफलता नहीं है। संसार में सभी के लिए अवसर हैं और ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को कुछ विशेष गुण देकर भेजा है।

जो व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या करना छोड़कर स्वयं को बेहतर बनाने में लग जाता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और शांति प्राप्त करता है।

आइए, हम ईर्ष्या को त्यागकर प्रेम, सहयोग और सद्भाव की भावना को अपनाएँ। यही सुखी जीवन और श्रेष्ठ समाज की आधारशिला है।

"दूसरों की सफलता देखकर दुखी मत होइए, प्रेरित होइए। क्योंकि ईश्वर ने आपके लिए भी एक अलग मार्ग और अलग अवसर निर्धारित किए हैं। 
  
रुद्र प्रताप सिंह 

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