प्रेम की पराकाष्ठा
जिसे हम सबसे अधिक प्रेम करते हैं, उसी के लिए सबसे अधिक भय क्यों होता है? प्रेम मनुष्य के जीवन की सबसे सुंदर अनुभूतियों में से एक है। जब हम किसी व्यक्ति से गहरा प्रेम करते हैं, तो उसकी प्रसन्नता हमारी प्रसन्नता बन जाती है, उसका दुःख हमें भीतर तक प्रभावित करता है और उसकी सुरक्षा हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परंतु प्रेम के साथ एक विचित्र मनोवैज्ञानिक स्थिति भी जन्म लेती है—जिसे हम जितना अधिक प्रेम करते हैं, उसके विषय में उतने ही अधिक नकारात्मक और डरावने विचार हमारे मन में आने लगते हैं। वह घर से बाहर गया हो तो मन में प्रश्न उठने लगते हैं—वह सुरक्षित तो है? समय पर क्यों नहीं आया? फोन क्यों नहीं उठा रहा? कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई? उसकी तबीयत तो ठीक है? वास्तविकता में किसी अनहोनी का कोई प्रमाण नहीं होता, फिर भी मन कुछ ही क्षणों में अनेक भयावह कल्पनाएं बना लेता है। यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि प्रेम, जो विश्वास और आनंद का स्रोत होना चाहिए, कभी-कभी चिंता और भय का कारण क्यों बन जाता है? प्रेम के साथ खोने का भय जुड़ जाता है ...